खैराड़

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Author of this article is पी एन बैफलावत

खैराड़ प्रदेश


राजस्थान का इतिहास गौरवशाली रहा उसमे आदिवासी सर्वोपरि है । यहाँ के प्रकृति पुत्र आदिवासी इस धरा पर आदिमकाल से ही रहते आये है उनमे प्रमुख मीणा और भील है । यह प्रदेश कई उप क्षेत्रो मे विभिक्त था - मेवाड़,मारवाड़,मेरवाड़ा,ठढूढाड़, हाड़ोती और खेराड़ । उनमे अपनी वीरता के लिए खैराड़ का विशेष महत्व है । खैर वृक्ष की बहुलता के कारण इस क्षेत्र का नाम खैराड़ बताया जाता है । भाषाविज्ञान के अनुसार खैर+राष्ट्र= खैराष्ट्र=खैराट अन्त मे ‘ट ‘का स्थान ‘ड़’ के लेने के बाद नामाकरण " खैराड़" हुआ मीणा आदिवासियो की बहुलता के कारण इस प्रदेश को " मीणा खैराड़ " भी कहा जाने लगा बनास नदी के दोनों ओर के प्रदेश को खैराड़ प्रदेश कहा जाता है जिसके अन्तर्गत - प्रमुख गाँव लुहारी कला, उमर गाँव,सरस्या,गाड़ोली,ईटूड़ा, देवा खेड़ा, बासनी,टिकड़,गौमरगढ़,हिण्डोली, देवली का कुछ क्षेत्र,माण्डलगढ़ और जहाजपुर के आस पास का क्षेत्र आता है

अर्सकीन के अनुसार आदिवासियो के दो प्रमुख क्षेत्र है- एक तो छप्पन के पहाड़ और दूसरे खैराड़ का क्षेत्र यहाँ के निवासियोँ को कर्नल टॉड ने इन्हे " सच्चे प्रकृति पुत्र" कहा है व सम्मान देने वालो को सम्मान देने की प्रबल भावना यहाँ की धरोहर कहा है वीरता व शौर्य वहाँ के आदिवासियो की रग रग मे बसी उनकी धरोहर है । पहाड़ी और अनपजाऊ होने कारण ये पूर्णतः आयुध्दजीवी थे युध्द ही इनकी आजिविका का साधन रहा है यह विभिन्न प्रतेशो से आये आदिवासियो का संगम स्थल है वीर विनोद के लेखक श्यामल दास के अनुसार मेवाड़ के जहाजपुर इलाके (खैराड़) मेँ मोठीस तथा पड़िहार मीणाओ की बहुलता है मीणो के 12 मेवासियो मे खैराड़ के पेमा पड़िहार व जोंझों खोखर का विशेष नाम है ।

मध्यकाल मे बनास नदी के दोनो ओर बसे खैराड़ प्रदेश में " बरड़" गोत्रिय मीणा आदिवासियो का राज्य था जिसकी राजधानी गोमरगढ़ थी इस राज्य को महाराणा प्रताप के भाई जगमाल जो अकबर की सेवा मे चला गया था जहाजपुर परगना जागीर मे मिलने पर छीना यह 1584 के आस पास की घटना है माधजी सिन्धिया के जहाजपुर क्षेत्र मे आने पर की सैनिक सहायता का भुगतान न देने पर मीणा सरदार ने चेतावनी दी की हम लेना जानते है दूसरे दिन ही मराठो की रसद काट दी अन्त मे मरोठो को भुगतान देना पड़ा । अंग्रेजो व रियासती शासको के दमन व अधिकारो मे की कटौती को लेकर भुवाना पटैल व गोकुट पटेल के नेतृत्व मे 1855 मे मीणाओने विद्रो किया |वीर विनोद मे उल्लेख करते हुए श्यामलदास ने लिखा है कि खैराड़ के मीणा बहुत बहादूर होते थे और लड़ाई के समय भीलोँ की तरह डू डू डू डू करके डूडकारी करते है तथा ये अपने पूर्वज 'माला' जुझार की सौगन्ध खाते है 1891 मे मेवाड़ मे मीणो की संख्या 20032 है " | मेवाड़ महाराणा राजसिह के समय ई 1662 मेँ खेराड (भीलवाड़ा) के मीणो ने विद्रोह किया उनको दबाया समझौते मे 1667 मेँ मीणो के सरदार पीथा को जाड़ोली(जाजपुर ) की स्वतंत्र जागीर दी गई ताकि मीणा शान्त हो जाए और शासन पर आस्था उत्पन्न हो सके । ये सब घटनाए साबित करती है कि राजस्थान के आदिवासियो ने निरन्तर स्वतंत्रता युध्द जारी रखा है चाहे सत्ता कोई भी हो क्योकि वो जानते है कि हमारे पुरखे इस धरा के मालिक और मूलनिवास है |....

year 1809 में महादजी सिंधिया की मराठा का नेत्रित्व कर रहे Mr. brrautan ने अपने पत्रों में आदिवासी मीणा का उअल्लेख करते हुए लिखा है की -खैराड़ प्रदेश जहाजगढ़ (जहाजपुर ) के मीणा सेनिको का दस्ता मराठा केम्प में आया .हुवा था मैंने एक सेवक भेजकर उन्हें बुलाया वे 13-14 व्यक्ति थे उन्होंने खुशनुमा मिजाजसे प्रवेश किया और मुझे अपने रीती रिवाजो अनुसार आदर दिया वे तीर- धनुष और कटर जैसे हथियार लिए थे उनकी पगड़ी काफी ऊँची बंधी हुई थी और शीर्ष पर बोझा पक्षियों के पंख लगे थे .सैनिक सहायता का भुगतान न देने पर मीणा सरदार ने चेतावनी दी की हम लेना जानते है दूसरे दिन ही मराठो की रसद काट दी अन्त मे मरोठो को भुगतान देना पड़ा । .

(their turban very high ornomented on the top with bunch of feather of a species of curlew,called Bojha).......ukt chitra usi kherad (Jahajpur) ke meena sardar ka hai ...jise Mr.Brrautan ne banaya tha |

उदयपुर राज्य के जहाजपुर परगने अर्थात खेराड के मीणाओ ने 1851 में अंग्रेजो की नई राजस्व व्यवथा के खिलाफ भुवाना पटेल व गोकुल पटेल के नेतृत्व मे विद्राह कर दिया इस क्षेत्र के मीणा राजसता से मुक्त थे केवल महाराणा मेवाड़ की प्रतिकात्मक सत्ता स्वीकार करते थे मीणा व भीलो के विद्रोह केवल अंग्रेजो के विरुद्ध ही नहीं थे बल्कि वे सम्बंदित राज्यों के भी विरुद्ध थे जिसके माध्यम से अंग्रेज अपनी नीतियों को कार्यान्वित करवा रहे थे शौषण और अवैध धन वसुली के खिलाफ मीणों ने बगावत कर दी विद्रोही मीणाओ ने न केवल राजस्व अधिकारियो व महाजनों को लुटा बल्कि अंग्रेज छावनियो को भी लुटा । उनके दमन के लिए उदयपुर से एक सेना मेहता अजित सिंह के नेत्रत्व में शाहापुरा ,बनेडा ,बिजोलिया, भेसरोड़, जहाजपुर एवं माँडलगढ़ के जागीरदारों की सेनाये साथ लेकर पहुची एजेंट टू गवर्नर जनरल इन राजपुताना के कहने पर जयपुर, टोंक, बूंदी राज्यों की सीमओं पर चोकसी बड़ा दी ताकि जहाजपुर के मीणाओ को अन्य मीणाओ की सहायता न मिले |उदयपुर की सेनाओ ने छोटी लुहारी व बड़ी लुहारी नामक गाँवो पर आक्रमण किया जो मीणा मुखियाओ भुवाना पटेल व गोकुल पटेल के गाँव थे सेनाओ ने दोनों ही गाँवो को नष्ट कर दिया तथा मीणे सपरिवार मनोहरगढ व देवखेडा की पहाडियों में जाकर मोर्चा लिया वहा उन्होंने रक्षात्मक स्थिति प्राप्त कर ली थी इसी बीच जयपुर ,बूंदी ,टोंक राज्यों से तमाम प्रतिबंधो के उपरांत भी लगभग 5000 मीणे जहाजपुर के मीणो की सहायतार्थ पहुच गए थे मीणाओ ने बड़ी बहादूरी से ये युध्द लड़ा अंत में रियासतो व सरकार की फौजे हारकर पीछे हट गई उनके 57 सिपाही मीणो के हाथो मारे गए .यह मीणाओ की बहुत बड़ी सफलता थी

मीणा आदिवासियो मे 12 प्रसिध्द मेवासी हुए है उनमे खैराड़ के पेमा पड़िहार व जोझों खोखर का विशेष महत्व है यहाँ मेवास और मेवासी शब्दो का अर्थ स्पष्ट करना भी उचित होगा । मेवास- मेवास वह दुर्गम पहाड़ी, कन्दराओ के ऊपर प्रकृति के बीच बसा गढ़ होता है जहां तक पहुचना आदिवासियो के अलावा और किसी अन्य का पहचना सभ्भव नही । मेवास के अधिपति को ' मेवासी ' कहा जाता था अर्थात मेवासी ऐसे स्थान के अधिपति से है जो किसी शासक के अधीन न रह कर स्वतंत्र विचरण करता हुआ अपनी स्वतंत्र सत्ता का प्रदर्शन करता था और अपने निजी सैन्य बल से शासक माने जाने वाले लोगो को भयभीत किये रहता था । ऐसे मेवासी को वश करना अत्यन्त कठिन कार्य समझा जाता था ।

पीथा मीणा भी इस क्षेत्र का एक प्रसिध्द व्यक्ति था | सरस्या गाँव (जहाजपुर) के श्री राम मोठीस ने पिँजरे मेँ नाहर (शेर) को कैद कर भाट को दान दिया । 1857 की क्रांति मेँ तात्या टॉपे जब खैराड़ क्षेत्र मे आये तो यहाँ के मीणा आदिवासियो ने भरपूर सहायता की और कई युध्दो मे अंगेजो को हराया । 1851- 60 के आस पास यहाँ के मीणाओ को बड़ी संख्या मे फौज मे भर्ति किया । मेवाड़ के महाराणा के कहने पर इस क्षेत्र का बलदेवा मीणा (बलदेव सिंह) ने 3000 मीणा फौज मे भर्ति कराया जिसके बदल महाराणा ने दरबार मे बुलाकर सम्मान व इनाम के रूप मे 3000 चांदी के कलकार देने की पेशकश पर बलदेवा मीणा ने कहा कि अगर आप देना ही चाहते हो तो मेरी कौम का पुराना सम्मान "सिँह" जो छीन लिया गया वापिस लौटा दे तब महाराणा ने ऐसा आदेश प्रसारित कर दिया बलदेवा अब बलदेव सिह हो गये ।

फौज मे भर्ती होना इस क्षेत्र की परम्परा है भारत को स्वतंत्र करने के आश्वसन के बाद यहाँ के लोग अग्रेज फोज के रुप प्रथम व द्वितिय विश्व युध्द मे लड़ने गये बहादूरी से युध्द लड़ा अंग्रेजो को विजय दिलाई कई मीणा सरदारो को वीरता पुरस्कारो से नवाजा गया सुभाष चन्द्र बोस की आजाद हिन्द फौज मे यहाँ के कई सैनिक थे । सुभाष चन्द्र बोस के ड्राईवर भी इसी क्षेत्र के उमर गाँव के थे यहाँ के गाड़ोली,लुहारी,बासनी ओर उमर गाँव के सैकड़ो मीणा आदिवासी लोग भारतीय सेना मे है । उमर अकेले गाँव के अब 7000 लोग फौज मे भर्ति हो चुके । यहाँ के लोग प्रथम व द्वितीय विश्व मे लड़े थे 16 लोगो का रिकार्ड अब तक है जिनकी कई विधवाये अब भी जीवित है जिनको पेशन भी मिलती भारत सरकार से । यह एक मात्र गाँव है जिसमे से सर्वाधिक लोग भारतीय फौज मे है इस गाँव को तो भारतीय फौज गौद भी ले रखा है इस क्षेत्र को आदिवासियो की वीर धरा कहा जाये तो अतिश्योक्ति नही होगी ।

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