गणपतराम बगराणया

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गणपतराम बगराणया

श्री गणपतराम बगराणया स्वतंत्रता के अनन्य पुजारी स्वतंत्रता, साहस तथा धैर्य किसी जाति की बपौती नहीं है, जिस श्रेत्र में जो आगे बढ़ता है, वही नाम कमाता है l स्वर्गीय श्री गणपतराम बगराणया ऐसे निर्भीक साहसी पुरुष थे जिन्होंने ताल ठोककर सामन्तवाद का पुरजोर विरोध किया l नरड निवासी मीणा जाति के इस महापुरुष ने अपने व्यक्तित्व की अनूठी छाप समाज पर छोड़ी l समाजसेवी सामाजिक कुरीतियों एवं मीणा समाज की स्वतंत्रता की भावना को दबाने के लिए जरायम पेशा कानून का निरंतर विरोध करते रहे l श्री गणपतराम बगराणया निर्भीक एवं निडर व्यक्ति थे सामन्तवाद ही नहीं वरन् उनके शीर्षस्थ जयपुर नरेश द्वारा जरायम पेशा कानून के अंतर्गत होने वाले अन्याय का विरोध किया l वे शिक्षित एवं सूझबूझ वाले व्यक्ति थे, उन्होंने जयपुर राज्य के अत्याचारों का कच्चा चिट्ठा एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जिससे खीज कर जयपुर नरेश ने उन्हें अपने राज्य से निष्काषित कर दिया l परन्तु विद्वान पुरुष सर्वत्र पूजे जाते हैं l जयपुर से निष्काषित होकर वे उदयपुर के महाराणा के दरबार में पहुँच गए l वहाँ अपने व्यक्तित्व सूझ-बूझ की ऐसी छाप छोड़ी कि उदयपुर के महाराणा अल्पकाल में ही प्रभावित हो गए l उनकी प्रतिभा को देखकर एक समय महाराणा ने उनको पूछ ही लिया कि आप कौन हो? और किन-किन परिस्थितियों के कारण आपको जयपुर छोड़ना पड़ा l

श्री गणपतराम की करुण कहानी सुनकर महाराणा का हृदय पसीजे बिना नहीं रहा और उनहोंने तत्काल जयपुर स्टेट के नाम एक पत्र भेजा कि आप ऐसे रत्न को क्यों खो रहे हैं l महाराणा के पत्र का जयपुर नरेश पर ऐसा प्रभाव पड़ा की उनका निष्कासन रद्द कर दिया गया और पुनः वे अपने घर आ गए l अपने परिवार के साथ रहते हुए उन्होंने मीणा समाज के सुधार तथा उन्नति का भार अपने ऊपर ले लिया l मीणा सुधार समिति पर उनका सदा ही वरदहस्त रहा l शिक्षित एवं प्रबुद्ध व्यक्ति होने के कारण उन्होंने अनेक समाज सेवक तैयार कर लिए l मीणा समाज की उन्नति के लिए उसमें व्यापत कुरीतियों को छुड़ाना उन्होंने आवश्यक समझा और उन्होंने समाज सुधार के स्वयं सेवकों के अनेक जत्थे तैयार किये, जिनका विस्तृत विवरण हम विगत पृष्ठों में पढ़ चुके हैं l इन जत्थों ने चोरी चकारी, चौकीदारी, मधपान करना उसे निकालना जैसी बुराइयों को जड़ से समाप्त करने का बीड़ा उठाया l नयाबास, भोड़की तथा बजावा का तो उन्होंने काया कल्प ही कर दिया l

संक्षेप में उनका जीवन दर्शन इस प्रकार है l उन्नति के लिए जाति की एकता आवश्यक है अन्याय का विरोध करना मनुष्य मात्र का धर्म है l यह मीणा जाति सदा ही अन्याय का विरोध करती आई है l मुस्लिम शासन काल में जजिया कर का विरोध करने का बीड़ा इसी जाति ने उठाया था l जरायम पेशा कानून का विरोध हमें प्राण देकर भी करना चाहिए l यह प्रसन्नता की बात है कि राष्ट्रपिता म. गाँधी, पं. जवाहरलाल नेहरु एवं सरदार पटेल की प्रेरणा के इस काले अमानवीय कानून को समाप्त करने में हमें सफलता मिली l परन्तु अभी हम बहुत ही कुरीतियों एवं अंधविश्वासों में जकड़े हुए हैं l विशेषकर जातीय एकता की हममें बहुत कमी है l इसके लिए बहिष्कृत उद्धार कार्यलय घरढाना कार्यालय खोला है l अतः जातीय एकता के लिए आप इस कार्यालय से संपर्क करें l

संदर्भ