गाली गीत

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Author of this article is पी एन बैफलावत

मीणा गाली गीत


राजस्थान के लोक संगीत की जनक मीणा आदिवासी महिलाए ही है ये पारम्परिक लोकगीत ..पहले किसी पुस्तक से नहीं, सीधे लोक हृदय से लोकवाणी मेँ उतरे है । ये मौखिक परम्परा और अनुश्रुति. पर आधारित रहे है । मीना महिलाओ में किसी ओसर मोसर में ब्याई सगा जनों की मेहमानी गाली गायन (मीना लोकगीत का एक प्रकार और राग) से की जाती थी |

जिसमे

1-छिलो करती छिला माले चढ़गी

2-तीन रे तुल्यां की लोड़ी रेल रे बनाई

3-धोला धोला चावल दुबारा की दारू

4-मजा का चावलिया..

5-शरी नगर सु पंखो उतरयो

6-नायला में राठोडा को राज दपहरी में कोडे ज्याली रे प्रमुख गालियां रही है जो अब भी ओसर मोसर पर गाई जाती है

नायला में राठोडा को राज दपहरी में कोडे ज्याली रे एक शोषण को मुखरित करता हुवा गाली गीत है ..प्राचीन काल में नायला क्षेत्र में भीखम देवड़वाल मीना मुखिया का मेवासा था जिनका राजपूतो और मुसलमानों से काफी संघर्ष चला भिखम के पुत्र नायल और उनकी दो पुत्री इस संघर्ष में लड़ते हुए इस धरती के लिए बलिदान हो गए जिनके स्थानक बने हुए है नायला जब कछावा राजपूतो के अधीन हो गया तो यह जयपुर के रिश्तेदार राठोड़ो को जागीर के रूप में मिला अर्थात नायला में राठोड़ राजसता में आ गए | तब यह क्षेत्र उनके शोषण, अनाचार और अत्याचारों से त्रस्त था उस समय आदिवासी महिलाओ ने जो महसूस किया उसे लोकगीत के रूप में मुखरित किया |