गोदना

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यह प्रथा एक कला है। अंग प्रत्यंग को सुन्दर बनाने की भावन के कारण ही गोदना की जाती है। इसके साथ कई लोक विश्वास जुड़े हुए हैं। जैसे कुछ जनजाति का यह मानना है कि गोदना अगर शरीर में हो, तो नज़र नहीं लगेगी । आदिवासियों द्वारा बबूल के कांटे को बालोर के रस में डुबो कर शरीर में उस कांटे को शरीर में चुभाकर गोदना गुदवाये जाते हैं ।

महिलाओं के शरीर में तरह-तरह की गोदना कला दिखाई देती है। पुरुष के शरीर में एक आध ही चिन्ह, अपना नाम या कभी-कभी कोई धार्मिक चिन्ह गोदवी हुई दिखते हैं। गोदने शरीर के अलग-अलग हिस्से पर किया जाता है - हाथों पर, बाँह पर, चेहरे पर, जंघा पर, पीठ पर, पैर के पंजों पर गोदने गुदवाये जाते हैं। अलग-अलग जनजाति का अलग-अलग अभिप्राय होता है और विशेष अंगों पर ही गोदना अंकित किये जाते हैं ।