घाटमदास

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Author of this article is पी एन बैफलावत

आदिवासी महात्मा घाटमदास

राजस्थान के आदिवासियो ने अपनी मातृ भूमि की रक्षा, जनसेवा व अपने वजुद के लिए संघर्ष की छाप हर क्षेत्र मे छोड़ी है जब छल कपट से उनके हाथो से राज सत्ता चली गई । तब भी उन्होने स्वतंत्रता युध्द जारी रखा |राजस्थान मेँ आने वाली हर बाहरी ताकत से लोहा लिया । इसके परिणास्वरुप राजस्थान के आदिवासियो का सर्वाधिक दमन और शोषण हुआ उसे पेट भरने के लिए भी मोहताज होना पड़ा पर स्वाभिमानी आदिवासियो ने कभी भीख नही मांगी वे आयुध्दजीवी हो गये युध्द ही इनका पेशा था । वे अपने क्षेत्र को हमेशा स्वतन्त्र मानते थे अतः अपने क्षेत्र से निकलने वाले हर व्यापारी,सेठ,राजा और महाराजा से बोलाई (बोराई) कर लेते थे । कर नही देने वालो को आदिवासी कानून के हिसाब से दण्डित करने के लिए कई दल बना चुके थे । उनको आम लोग डकैत कहने लगे । आदिवासी समाज मे ऐसा ही एक प्रसिध्द डकैत हुआ जो "घाटम" के नाम से जाना जाता था वह अपनी मातृभूमि के लिए लड़ने वाला और गरीबो का मसिहा कहलाता था । सेठ साहुकारों को लुट गरीबोँ को खाने को अनाज व कुवांरी बेटियो की शादी मे सहयोग करता था । उसमे परमार्थ व जनकल्याण की भावना थी । किसी संत के सम्पर्क मे आने के बाद वे सन्त बन गये जो "सन्त घाटमदास" के नाम से प्रसिध्द हुए । सन्त बनने के बाद भी मांगना स्वाभिमान के खिलाफ समझ कर उदर पूर्ति व परमार्थ के लिए डकैती कार्य करते थे घाटमदास के चमत्कार, तपोबल व परमार्थ के कार्यो से प्रभावित होकर जयपुर के राजा ने "घाटम आश्रम" बनवा दिया था । जिसे घाटमघाट कहा जाता है । झुथा राम नाढ़ला ने पुराना घाट को ही " घाटम घाट माना है जहां इस आदिवासी संत का आश्रम था । दादूपंथी ब्रह्मदास ने अपनी "भक्त माल " मेँ ' घाटम का घोड़ा पलट किया उजरै से कारो ' कहकर उनके चमत्कार की घटना का वर्णन किया है राघवदास ने भी भक्तमाल मेँ उनके संत बनने की घटना का वर्णन किया गया है । 1740-50 के बीच गुड़गाँव हरियाणा के प्रसिध्द संत श्री नित्यानन्द ने अपने पुस्तक "शब्द संग्रह" (साखिया) मे घाटमदास के तपोबल की प्रशंसा की और उसे मीणा आदिवासी बताया । घाटमदास जी की पूरी जानकारी अभी तक उपलब्ध न हो पाई पर कोई इन्है खोड़ी गाँव जयपुर के मानते है कोई इन्हेँ चिबा सिरोही तो कोई मगरा का मीणा बताते है । कई जगहो का नाम इनके नाम पर है और कई जगह इनके मन्दिर व समाधि स्थल बने है । समाधि स्थल पर लगी मूर्ति की उक्त फोटो श्री रमेश मीणा केशरपुरा ने उपलब्ध कराई है ।

घाटम ऋषि का प्रभाव उत्तर प्रदेश, हरियाणा(पँजाब), मध्यप्रदेश,राजस्थान न केवल उत्तरी भारत तक वरन दक्षिण भारत तक था । शकुन लेकर डकैती पर जाते थे एक दिन किसी महान सन्त से उनकी भेट हो गई सन्त के उपदेश व क्षणिक सत्संग ने घाटम को सत (प्रकृति शक्ति) का ज्ञान करा दिया और उसका सारा जीवन बदल कर रख दिया । अब घाटम्या डकैत से घाटमदास बन निरंकारी सत का ध्यान करने लग गये । सत की भक्ति तथा विनय के पद आंतरिक उद्गार के रूप मेँ उनके हृदय से स्वतः फूट निकले :-

कुण जाणै पराये मन की,

तन की, मन की लगन की ।

कुण जाणै पराये मन की

चोट सहै सिर घन की ॥

चानण सी रैन संतन कु चाहिए,

सूरत लगी रै सत भजनन की ।

अंधेरी की रात चोर कुँ चाहिए,

सूरत लागी रै पर धनकी ॥

घाटम दास जात को मीणो,

पर दुखै अपने जन की । "

इस प्रकार वे कवि भी बन गये । जयपुर रियासत के तत्कालीन कवियोँ मे संभवतः ये एक मात्र कवि संत थे । यह घाटमदास ही आगे जाकर " महात्मा घाटमदास" कहलाये । इनकी गाथा कृष्ण स्नेही की पुस्तक " भक्तमाल भाषा" के पृष्ठ- 252 पर संग्रहीत है । " भक्तमाल" मे 'घाटम' का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि एक दिन अपने डकैती के धन्धे से ग्लानि होने के कारण वे दुखी होकर एक संत के पास गए जिन्होने उन्हेँ सत कर्म और सत भजन करने का उपदेश दिये सत आराधना या किसी सन्त द्वारा ये कहने पर की मै पैदल चलने मे सक्षम नही और सफर बहुत लम्बा है कोई साधन मिल जाये तो अच्छा होगा ।हालात का भान कर अपने सेवा कर्म का पालन करते हुए उन्होंने जयपुर राजा की घुड़साला से एक काला घोड़ा चुरा लिया तथा उस पर चढ़ कर आकर संत से भेट की । घोड़ा लाकर खुटे से बांध दिया । कहते है राजा के सिपाही जब घोड़े की तलाश मे खोज खोजते हुए आश्रम के पास आये तो उनके देखते देखते घोड़ा काले से सफेद हो गया जिसे देखकर के चमत्कृत हुए । उन्होने वापिस जाकर राजा को सारी घटना सुनाई तो राजा ने "घाटम" को बड़ा आदर दिया और उनके रहने के लिये आश्रम भी बनवा दिया जिसे " घाटमघाट" कहा जाता है । वर्तमान मेँ उसी जगह घाटगेट दरवाजा है । कहते है "सेऊ सम्मन" नामक प्रसिध्द भक्त व कवि इनके शिष्य थे । वे पाटन, उदयपुरवाटी, सीकर के सेवरिया गौत्र के मीणा थे । दादूपंथी बह्मदास चारण लिखित ' भक्तमाल' पृष्ठ- 53 पर ' घाटम का घोड़ा पलट किये ऊजळे कारे' कह कर उपर्युक्त घटना का वर्णन किया गया है । इसमेँ घोड़ा चुराने का कारण गुरु भेँट का उद्देश्य बताया गया है ।

इसमेँ 'घाटम' की सत्यवादिता की प्रशंसा की गई है । कहते है की " घाटमदास सत भजन मे लीन रहते थे परमार्थ व अपने लोगो को सत मार्ग पर चलकर जीवन सुधारने की सीख देते थे । उनकी परमार्थ सेवा के बारे मे सभी साधु सन्त जानते थे इसलिए उनकी सात्विक प्रवृति को देखते हुए कई बार इनके यहां ठहरते और भोजन पानी लेकर जाते थे । एक बार रात के समय घोड़ो पर सवार साधुओ की कोई जमात रात्रि विश्राम के लिए घाटमदास के रुक गये । संतो को भोजन कराना जरुरी था । इसलिए वहा साधुओ को आराम करने की कहकर भोजन की तलाश मे निकल गये । इस घटना का वर्णन उन्होने अपने एक पद मे की है जो इस प्रकार है :-

"लेई कटारो, बांध भाभरु, रमग्यो रात अंधेरी ॥

जाय खलाँण में गेहुँ बाध्याँ, बांधी खाँखला की खारी ।

आय गुवाड़ में हेलो मार्यो, उठो ऐ नार, चातर म्हारी ॥

जाय बाण्याँ की हाट मेँ बड़ग्यों खाँड, हांडी घी की चोरी ॥

आय गुवाड़ हैलो मार्यो, उठो ऐ नार चातर म्हारी ।

बणी रसोई, उठो भाई साधो, पत्तल संभ्भाळो थारी ॥

जीम चूँट थारै घराँ पधारो, अब झगड़ो होसी भारी ।

उत्तर दिशा सूँ उठी बादळी, बरखा बरसी भारी ॥

कहे घाटम मगरा को मीणो, भोळा भगताँ की सत सुधारी ॥

अर्थ :- हाथ मेँ कटार ली, पांवो के तलवो मे भाभरु (एक घास) बांधा, ताकि खोज ( पद चिन्ह) पहचानने में न आ सके खालियान ( जहाँ काट कर गेहु रखे जाते है ) में गेहुँ की तैयार रास (ढेरी) मै से कुछ गेहु लिये, घोड़ो के लिए चारा लिया । बनिये की दूकान मेँ सेँध लगाकर शक्कर और घी की मटकी चुराई । घर आकर भोजन बनवा परोसा और कहा की आप भोजन करके यहां से प्रस्थान करो । सूबह चोर की तलास करता हुए जमीँदार और बनिया यहाँ आकर झगड़ा करेगेँ । घाटमदास के इतना कहते ही उसी समय तेज आंधी आई और वर्षा हुई जिससे सारे खोज (पद चिन्ह) साफ हो गये । इस प्रकार सत शक्ति ने घाटमदास भगत को विपत्ति से बचा लिया । ढ़ूंढ़ाड़, हाड़ौती और गोड़वाड़ मेँ महात्मा घाटमदास को श्रध्दा के साथ याद किया जाता है । उस सदी मे घोर विपत्तियो,गरीबी,शोषण व सामाजिक बुराईयो से घिरे आदिवासी समाज को घाटमदास जी मनोबल बढ़ाकर,सामाजिक बुराईया दूर कर सत का मार्ग बतलाया । फुलेरा-रीगस रेल मार्ग पर रेल्वे स्टेशन भैसलाना से 5-6 किलोमीटर पश्चिम मेँ स्थित भादवा गाँव तह॰ चोमू जिला जयपुर मे महात्मा घाटमदास का एक बहुत बड़ा स्मारक है । सिरोही,पाली और जालौर जिलों के आदिवासी महात्मा घाटमदास को अपना गुरु मानते है । अपने आपको उनके वंशज कहलाने में गर्व महसूस करते है । सिरोही जिले मे मीणाओ का प्रसिध्द तीर्थ स्थान गौतमेश्वर है जहाँ प्रति वर्ष 12,13 व 14 अप्रैल को तीन दिवशीय मेला भरता हे वहां भी महात्मा घाटमदास का एक प्राचीन मन्दिर है । हाड़ौती मे भी महात्मा घाटमदास के बारे मे कई किवंदन्तियाँ प्रचलित है । सीमल खेड़ी (जिला झालावाड़) निवासी मौक्तिकराम दर्प परमार ने हाड़ॉती मेँ प्रचलित ऐसी ही एक किवंदन्ती का उल्लेख अपनी काव्य कृति "मीनायण" मे किया है । " मीणा रागनी एवँ बारह मेवासी" नामक पुस्तक में भगवत अदूतानन्द गिरी (मीणा) ने भी घाटम ऋषि का वर्णन किया है और उसे मीणा समुदाय का महानतम समाज सुधारक सन्त बताया है ।

अदूतानन्द गिरी टहला तालाब गाँव अलवर (राजस्थान) के रहने वाले और उखलाना टौक के जैन मुनिमगन सागर (मंगला गोठवाल मीणा) के समकालिन समाज सुधारक थे । वे 1939 मेँ आदिवासी मीणा समाज सुधार संगठन के अध्यक्ष थे तथा 1942 के दिल्ली के विराट आदिवासी मीणा सुधार सम्मेलन की अध्यक्षता इन्होंने ही की थी । गुड़गाँव के प्रसिध्द सन्त नित्यानन्द ने अपनी पुस्तक " शब्द संग्रह " मे घाटमदास के तपोबल की प्रशंसा की और उनकी तुलना दादू दयाल और माता सबरी से की । श्री रामविलास शर्मा व्याख्याता गुड़गाँव सन्त नित्यानन्द और उनकी कृति पर शोध कर रहे है उनसे किसी चितोड़ निवासी लक्ष्मी नारायण के जरिये हुई मेरीबात के दोरान उन्होने इसे मीणा सन्त बताते हुए और जानकारी देने कि कही जो मैने उनको बताई । साधु सन्त जमात में घाटमदास का बड़ा सम्मान है तथा वे मीणो को घाटमवंशी मानते है । नागा व सतनामी साधु भी मीणाओ को घाटमवंशी ही बतलाते है । घाटमदास के दो पुत्र थे - सगड़ और मगड़ वे और सेऊ सम्मन इनके प्रसिध्द शिष्य बने जिन्होने आदिवासी समाज सुधार के कई कार्य किये । हाड़ौती में बली ग्राम भी घाटम ऋषी से सम्बन्धीत जगह है । उत्तर प्रदेश मे भी इनके नाम पर कानपूर मे घाटम नगर है । इनका गाँव खोरी बिदारा शाहपुरा जयपुर व खोड़ि (खोरी,खेड़ी) बस्सी जयपुर भी बताया जाता है । घाटमदास की ढाणी नाम से अजीतगढ़ थोई कांवट रोड़ जयपुर भी है । घाटम चिपलाटा नाम से नीमका थाना सीकर मे भी एक स्थान है । गांव पाड़ीव पँचायत - कालन्द्री जि सिरोही मे भी घाटमदास जी का एक स्मारक व समाधि स्थल बना है ऐसी मान्यता है की यहां पर उन्होने अन्तिम श्वास ली थी इसे उनकी तपस्या स्थली भी कह सकते है । तीलिया मील कालूपूर रेल्वे स्टेशन अहमदाबाद (गुजरात) मे भी गौतम ऋषि (मीणा सन्त) व घाटम ऋषि का स्मारक बना है जहां मेला भी लगता है । गांव- चिबा पंचायत चोटीला बागली तह॰ शिवगंज जिला सिरोही नाणा स्टेशन के पास भी घाटमदास जी का एक विशाल स्मारक व समाधि स्थल बना हुआ है यहाँ कि मान्यता है कि घाटम जी यहीँ सुटड़ा (सुसावत) गौत्र के मीणा थे । उक्त सारे तथ्यो से हम निष्कर्ष निकाल सकते है की 16-17 वी शताब्दी के आस पास जयपुर रियासत मे घाटमदास नाम के महान संत हुए जिनके नाम से जयपुर मे घाटगेट है उनकी कर्म भूमि सम्पूर्ण भारत था और संभवतः उनका अन्तिम समय ग्यारह मीणा परगना मारवाड़ मे बीता उन्होने अपने उपदेशो वसामाजिक चेतना के कार्यो से मारवाड़ के मीणा आदिवासियो मे जागृति लाने का प्रयास करने लगे । महात्मा घाटमदास का प्रवास जब मारवाड़ मेँ हुआ तो वहाँ के आदिवासी मीणो की दयनीय स्थिति व सामन्तो के मनमाने शोषण को देख बड़ा कष्ट हुआ उनके साथ किये जा रहे जानवरतुल्य व्यवहार व ऊच नीच छुआछुत को देखकर बड़े द्रवित हो वहां ही रहकर उनको वाजिब हक दिलाने और उन्हेँ संगठीत करने का मानस बना लिया । घाटमदास पराक्रमी कुशल योध्दा घुड़सवार व तीरांदाज थे । तत्कालिन समय मे मारवाड़ मे ग्यारह परगनो के मीणा संगठीत हो घाटमदास के साथ हो गये ।सामन्ती ताकत को यह रास नही आया । ग्यारह परगनो ने घाटमदास के निर्देश पर अपने आपको हथियार बन्द हो गोतमेश्वर मेले मे एकत्रित हुए और घाटमदास के नेतृत्व मे सामन्ती शोषण के खिलाफ संघर्ष करने का संकल्प लिया । कई युध्दो मे राजपूत सामन्तो को हराया और अपने आपको स्वतंत्र घोषित कर बराबर शासन चलाने लगे । अपने इलाके से गुजरने वाले सामन्त,सेठ, व्यापारी साहुकार से बोलाई (बोराई) कर लेने लगे । इससे सामन्त नाराज हो गये कहा जाता है कि सुरताण नामक सामन्त के नेतृत्व मे राजपूत एकत्रित हो गये । समझौता वार्ता का झांसा देकर अचानक आक्रमण कर दिया । पाड़ीव कालिन्द्री सिरोही मे घमासान युध्द हुआ मीणा सम्भल ना पाये और घाटमदास सहित दस प्रमुख मुखिया शहीद हो गये । जिसका साक्ष्य वहाँ बने घाटमदास के स्मारक और दस मुखियाओ की बनी छत्रिया है । महात्मा घाटम दास के कार्य और संघर्ष बागड़ (डूगरपुर-बांसवाड़ा) मे सन्त गोविन्द गिरी (गोविन्द्गुरु) के समान ही थे । हमारी हार्दिक इच्छा है कि महात्मा घाटमदास के पदो का संग्रह हो और उनके ऊपर शौध परक पुस्तक का प्रकाशन हो । साथ ही घाट की गुणी के पास बड़ा स्मारक बनाकर अभी हाल ही बनी सुरंग का नाम " महात्मा घाटम दास सुरंग" हो । किसी के पास भी इस विषय मे कोई विशेष जानकारी हो तो जरूर शेयर करे ।

संदर्भ सूची :-

1- मीणा इतिहास - रावत सारस्वत पृष्ठ- 119

2- आम लोगो से मिली दन्तकथाए

3-भक्तमाल भाषा-कृष्ण स्नेह पृष्ट- 252

4- मीणा जाति का उत्कर्ष- डॉ॰ शकुन्तला मीणा पृष्ठ- 362 से364,

5- मीणा रागनी- भगवता अदूतानन्द गिरी,

6- ढूढाड़ संस्कृति व परम्परा- स्व झुथा राम नाढ़ला

7- मीनायण- मोक्तिक राम दर्प परमार

8- शब्द संग्रह- संत नित्यानन्द हरियाणा

9- साक्षात्कार- 1 डॉ प्रहलाद दौसा 2- श्री लादू राम ब्याडवाल तख्तगढ़ जोधपुर 3- श्री रमेश चन्द्र मीणा केशरपुरा सिरोही इन्होने घाटमदास के स्मारक की फोटो भी उपलब्ध कराई ।

10- भगतमाल- दादूपंथी बह्मदास चारण- पृष्ठ -53