चांदा वंश

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खोहगंग किला,जयपुर

खोहगंग नगरी को बसाने का श्रेय चन्द्रवंशीय महाराज गंग को जाता है। इसको खोहगंग भी कहते हैं। ग्यारहवीं सदी में खोहगंग में आलन सिंह नामक (1090-1147) चांदा मीणा राज्य करता था। इनको रालनसी के नाम से भी जाना जाता था। वीर सैनिक होने के साथ साथ वह दयालू भी था। प्राचीन समय मे मीणा राजा आलन सिंह ने एक असहाय राजपूत माँ और उसके बच्चे को उसके दायरे में शरण दी थी

शिशु दूलहराय की माता इसी राजा की शरण में आई थी। जब आलन सिंह को दूलहराय का राजा पुत्र होने का पता चला तो उसकी क्षत्रियोचित शिक्षा की व्यवस्था की। जब दूलहराय चौदह साल का हो गया तो आलन सिंह ने उसे अपने प्रतिनिधि के रूप में दिल्ली जाट तोमर नरेश अनंगपाल से भेंट करने भेजा। कहा जाता है कि दूलहराय दिल्ली पांच वर्ष रहा। दिल्ली के प्रवास के समय उसे शासक बनने की उत्कंठा प्रबल हुई तो वह अपने स्वामी आलन सिंह के राज्य का ही स्वामी बन बैठने की तैयारी की। इसके लिये वो षड़यंत्र रचने की सोचने लगा। अपनी महत्वाकांक्षा को कार्यरूप में परिणिति करने के लिये उसने खोहगंग के राजवंशीय ढाढी से मंत्रणा की। ढाढी बारहट दूलहराय के व्यक्तित्व से प्रभावित हो गया और उसके कार्य में सहयोगी बन गया। उसने दूलहराय को बताया कि दीपावली के दिन प्रचलित परंपरा के अनुसार यहां के सभी मीणा नि:शस्त्र होकर राज-सरोवर में अपने पितरों को जल तर्पण करते हैं। अगर इस अवसर पर सुसज्जित सेना की सहायता से इन पर अकस्मात आक्रमण कर दिया जावे तो ये आसानी से परास्त किये जा सकते हैं और परास्त मीणाओं के राज्य पर अधिकार भी सुगमता से किया जा सकता है। दूलहराय ने खोहगंग के डूम (ढाढी) बारहट की मन्त्रणा को सफ़लताप्रदायक समझकर उस पर आचरण करने की ठान ली। भाग्यवश उसे अपने उद्देश्य प्राप्ति में दिल्ली के तोमर नरेश व चौहान राजपूतों के सहयोग का भी आश्वासन प्राप्त हो गया। निर्धारित दिवस पर जब दूलहराय ने खोहगंग के मीणाओं को सरोवर पर नि:शस्त्र तर्पण करते देख तो उन पर उसने अचानक धावा बोल दिया। इस प्रकार एक राजपूत होते हुए भी राज्य लिप्सा के वशीभूत होने के कारण उसने नि:शस्त्र मीणाओं पर धार्मिक कार्य करते समय आक्रमण कर खोहगंग पर अधिकार कर लिया। यह राजपूत चरित्र के सर्वथा विरूद्ध था। राज्य प्राप्ति पर दूलहराय ने ढाढी को वही पुरुस्कार दिया जो एक दूरदर्शी तथा कूटनीतिज्ञ राजा को देना चाहिये था। जो डूम अपने स्वामी का स्वामी-भक्त नहीं रह सका, वह नये स्वामी के प्रति किस प्रकार बफ़ादार रह सकता है। यह सोचकर दूलहराय ने उस विश्वासघाती डूम को मौत के घाट उतार दिया।[1]

संदर्भ

  1. "He who had proved unfaithful to his own master, could not be trusted by another" Tod. V. II. 81