जीण माता

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जीण माता का मंदिर परिसर का प्रवेश द्वार

जीण माता का मंदिर राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में अरावली पर्वतमाला के निम्न भाग में सीकर से लगभग ३० कि.मी.दूर दक्षिण में सीकर जयपुर राजमार्गपर गोरियां रेलवे स्टेशन से १५ कि.मी. पश्चिम व दक्षिण के मध्य स्थित है | यह मंदिर तीन पहाडों के संगम में २०-२५ फुट की ऊंचाई परस्थित है | माता का निज मंदिर दक्षिण मुखी है परन्तु मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व में है | मंदिर से एक फर्लांग दूर ही सड़क के एक छोर पर जीणमाता बस स्टैंड है | सड़क के दोनों और मंदिर से लेकर बस स्टैंड तक श्रद्धालुओं के रुकनेव आराम करने के लिए भारी तादात में तिबारे (बरामदे)व धर्मशालाएं बनी हुई है,जिनमे ठहरने का कोई शुल्कनहीं लिया जाता | कुछ और भीपूर्ण सुविधाओं युक्त धर्मशालाएं है जिनमे उचितशुल्क देकर ठहरा जा सकता है| बस स्टैंड के आगे ओरण (अरण्य ) शुरू हो जाता है इसी अरण्य के मध्य से ही आवागमन होता है |

जीण माँ भगवती की यह बहुत प्राचीन शक्ति पीठ है ,जिसका निर्माणकार्य बड़ा सुंदर और सुद्रढ़ है | मंदिर की दीवारों पर तांत्रिको व वाममार्गियों कीमूर्तियाँ लगी है जिससे यह भी सिद्ध होता है कि उक्त सिद्धांत के मतावलंबियों का इस मंदिर पर कभी अधिकार रहा है या उनकी यह साधना स्थली रही है | मंदिर के देवायतनका द्वार सभा मंडप में पश्चिम कीऔर है और यहाँ जीण माँ भगवती की अष्ट भुजा आदमकद मूर्ति प्रतिष्ठापित है | सभा मंडप पहाड़ के नीचे मंदिर में हीएक और मंदिर है जिसे गुफा कहा जाता है जहाँ जगदेव पंवार का पीतल का सिर और कंकाली माता की मूर्ति है| मंदिर के पश्चिम में महात्मा का तप स्थान है जो धुणा के नाम सेप्रसिद्ध है | जीण मातामंदिर केपहाड़ की श्रंखला में ही रेवासा व प्रसिद्ध हर्षनाथ पर्वत है |

हर्षनाथ पर्वत पर आजकल हवा से बिजली उत्पन्न करने वाले बड़े-बड़े पंखे लगे है | जीण माता मंदिर से कुछ ही दूर रलावताग्राम के नजदीक ठिकाना खूड के गांव मोहनपुरा की सीमा में शेखावत वंश और शेखावाटी के प्रवर्तक महाराव शेखा जी का स्मारक स्वरुप छतरी बनी हुई है|महाराव शेखा जी ने गौड़ क्षत्रियों के साथ युद्ध करते हुए यही शरीर त्याग वीरगति प्राप्त की थी | मंदिर के पश्चिममें जीण वास नामक गांव है जहाँ इस मंदिर के पुजारी व बुनकर रहतेहै |

जीण माता मंदिर में चेत्र सुदी एकम् से नवमी (नवरात्रा में ) व आसोज सुदी एकम् से नवमी में दो विशाल मेले लगते है जिनमे देश भरसे लाखों की संख्यामें श्रद्धालु आते है | मंदिर में देवी शराब चढाई जा सकती है लेकिन पशु बलि वर्जित है |

मंदिर की प्राचीनता

मंदिर का निर्माण काल कई इतिहासकार आठवीं सदी में मानते है | मंदिर में अलग-अलग आठ शिलालेख लगे है जो मंदिर की प्राचीनता के सबल प्रमाण है |

१- संवत १०२९ यह महाराजा खेमराज की मृत्यु का सूचक है |

२- संवत ११३२ जिसमे मोहिल के पुत्र हन्ड द्वारा मंदिर निर्माण का उल्लेख है |

३- ४. - संवत ११९६ महाराजा आर्णोराज के समय के दो शिलालेख |

५- संवत १२३० इसमें उदयराज के पुत्र अल्हण द्वारा सभा मंडप बनाने का उल्लेख है |

६- संवत १३८२ जिसमे ठाकुर देयती के पुत्र श्री विच्छा द्वारा मंदिर के जीर्णोद्दार का उल्लेखहै|

७- संवत १५२० में ठाकुर ईसर दास का उल्लेख है |

८- संवत १५३५ को मंदिर के जीर्णोद्दार का उल्लेख है| उपरोक्त शिलालेखों में सबसे पुराना शिलालेख १०२९का है पर उसमे मंदिर के निर्माण का समय नहीं लिखा गया अतः यह मंदिर उससेभी अधिक प्राचीन है |

चौहान चन्द्रिका नामक पुस्तक में इस मंदिर का ९ वीं शताब्दी से पूर्वके आधार मिलते है |

जीण का परिचय

लोक काव्यों व गीतों व कथाओं मेंजीण का परिचय मिलता है जो इस प्रकार है | राजस्थान के चुरू जिले के घांघू गांव में एक चौहान वंश के राजपूतके घर जीण का जन्म हुआ | उसके एक बड़ेभाई का नाम हर्ष था| और दोनों के बीच बहुत अधिक स्नेह था| एक दिन जीण और उसकी भाभी सरोवर पर पानी लेने गई जहाँदोनों के मध्य किसी बात को लेकर तकरार हो गई | उनके साथ गांव की अन्य सखी सहेलियां भी थी |

अन्ततः दोनों के मध्य यह शर्त रहीकि दोनों पानी के मटके घर ले चलते है जिसका मटका हर्ष पहले उतरेगा उसके प्रति ही हर्ष का अधिक स्नेह समझा जायेगा | हर्ष इस विवाद से अनभिग्य था | पानी लेकरजब घर आई तो हर्ष ने पहले मटका अपनी पत्नी का उतार दिया | इससे जीण को आत्मग्लानि व हार्दिक ठेस लगी | भाई के प्रेम में अभाव जान कर जीणके मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह घरसे निकल पड़ी | जब भाई हर्ष को कर्तव्य बोध हुआ तो वो जीण को मनाकर वापस लाने उसके पीछे निकल पड़ा | जीण ने घर से निकलने के बाद पीछे मुड़कर ही नहीं देखा और अरावली पर्वतमाला के इस पहाड़ के एक शिखर जिसे"काजल शिखर" के नाम से जाना जाता है पहुँच गई | हर्ष भी जीण के पास पहुँच अपनी भूल स्वीकार कर क्षमा चाही और वापस साथ चलने का आग्रह किया जिसे जीणने स्वीकार नहीं किया|

जीण के दृढ निश्चय से प्रेरित होहर्ष भी घर नहीं लौटा और दुसरे पहाड़ की चोटी पर भैरव की साधना में तल्लीन हो गया पहाड़ की यह चोटी बाद में हर्ष नाथ पहाड़ के नाम से प्रसिद्ध हुई | वहीँ जीण ने नव-दुर्गाओं की कठोर तपस्या करके सिद्धि के बल पर दुर्गा बन गई | हर्ष भी भैरव की साधना कर हर्षनाथ भैरव बन गया | इस प्रकारजीण और हर्ष अपनी कठोर साधना व तप के बल पर देवत्व प्राप्त कर लोगो की आस्था का केंद्र बन पूजनीय बन गए | इनकी ख्याति दूर-दूर तक फ़ैल गई और आज लाखों श्रद्धालु इनकी पूजा अर्चना करने देश के कोने कोने से पहुँचते है


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