जोरवाल

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जोरवाल, राजस्थान में पाया जाने वाला गोत्र हैं ।

Origin

History

टोडाभीम परगने के जोरवाल मीणा हमेशा अपनी बेहतरी और अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए संघर्षरत रहते रहे थे। उनकी इस संघर्षप्रियता के कारण आज भी इस क्षेत्र में यह कहावत प्रचलित हैं - जोरवाल जंगी, तलवार राखे नंगी! `परगना` शब्द के प्रयोग पर उठाई गई आपत्ति एक सीमा तक सही है। सल्तनतकालीन प्रशासन (सन् 1206-1526) में प्रान्तों (सूबों) को जिलों में बा¡टा हुआ था। जिले को तब `शिक` कहा जाता था। शिक परगनों में ब¡टे होते थे। संभवत: लगभग 80-100 गा¡वों को मिलाकर एक परगना बनता था। लेकिन मुगलकालीन प्रशासन (सन् 1526-1858 में जिले को `सरकार` तथा परगने को `महल- कहा जाने लगा था।

अकबर बादशाह के समकालीन आमेर के राजा मानसिंह के चाचा जगन्नाथ कछवाह को टोडाभीम जागीर में दिया गया था। `कच्छावाह री वंशावली` में टोडाभीम के जागीरदारों के नाम इस प्रकार दिये हुए हैं - जगन्नाथ, मनरूप, सुजानसिंह, गोपालसिंह, अणदसिंह, अमानसिंह और सुल्तान सिंह। इस सन्दर्भ में यहा¡ यह स्पष्ट कर देना असंगत नहीं होगा कि उस जमाने में बड़े-बड़े जागीरदारों के क्षेत्र में भी जमींदार होते थे।

बिहार से सहसराम और ख्वासपुर टाडा शेरशाह के पिता की जागीरी में थे। इस जागीर में कई जमींदार भारी सिरजोर हो गये। इसलिए अपने पिता की इन जागीरों का प्रबन्ध अपने हाथ में लेकर शेरशाह ने उन विद्रोही जमींदारों का दमन किया िाा। इस प्रकार जागीरदारों के तहत जमींदारों का होना एक आम बात रही है। टोडाभीम और उसके आसपास का इलाका पुरातन काल से ही मीणा बहुत रहा है। यदि टोडाभीम पर टाटड गोत्रीय गूजरों का कभी अधिकार रहा होता, तो जनश्रुतियों में उसका जिक्र अवश्य होता। इस क्षेत्र में टाटडत्र गोत्रीय गूजर पाये भी नहीं जाते। इस क्षेत्र से सम्बन्धित जितनी भी लोक-प्रचलित पुराीन घटनाओं का जिक्र सुनने में आता है, उनसे यही पता चलता है कि इस इलाके में मीणा हमेशा ही गूजरों पर हावी रहे थे।

आइने-अकबरी में आमेर के राजा मानसिंह के पिता का नाम भगवानदास लिखा है, जबकि उसके पिता का नाम भगवन्तदास था। भगवानदास, राजा मानसिंह का चाचा था जिसे लवाण जागीर में मिला हुआ था। इससे यही साबित होता है कि उस जमाने में इतिहास लेखक केवल अपने आश्रयदाताओं से सम्बन्धित तथ्यों की ही छानबीन करते थे, उनके सहयोगियों या विरोधियों के बारे में तथ्यात्मक जानकारी जुटाने का प्रयास न करके जो कुछ कहा-सुना जाता था, उसे वैसे ही स्वीकार कर लेते थे। फलस्वरूप विवरण कई प्रकरणों में एकांगी बनकर रह गया है।

टोडाभीम के जोरवाल मीणाओं की जमींदारी से सम्बन्धित तथ्यों को जानने के लिए उस जमाने की जमींदारों व्यवस्था के बारे में जानकारी हासिल करना जरूरी है। डॉण् हरफूल सिंह आर्य द्वारा लिखित मध्यकालीन समाज, धर्म, कला एवं वास्तुकला` में मध्यकालीन जमींदारी प्रथा और तत्कालीन जमींदारों की आर्थिक दशा पर अच्छा प्रकाश डाला गया । `सांलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी के सरकारी कागजातों से पता चलता है कि पूरे मुगल साम्राज्य में जमींदार होते थे। आगरा, देहली, पंजाब और अजमेर केन्द्र शासित प्रदेश थे। लेकिन इन प्रान्तों में भी जमींदारी का उल्लेाख् मिलता है।

जमींदार का शािब्दक अर्थ है भूमि पर अधिकार रखने वाला। चौदहवीं सदी में बनी और अफीफ ने जमींदार शब्द का प्रयोग अपने विवरणों में किया है। अबुल फजल ने जमींदार के लिए `बूमि` शब्द का प्रयोग किया हैं सत्रहवीं सदी में जमींदारी और जमींदार के लिए क्रमश: तालुका और तालुकेदार और जमींदार के लिए क्रमश: तालुका और तालुकेदार शब्दों का प्रयोग भी होने लगा था। दस्तावेजों मे जमींदार के लिए `मालिक` और जमींदारी के लिए मििल्यत` (मालिक के अधिकार) शब्दों का प्रयोग भी मिलता है। जमींदारी का सम्बन्ध गा¡व से था, न कि खेत से। मुगलकाल में इसका सम्बन्ध किसानों से पृथक ग्रामीण वर्ग से था। सुदूर प्रान्त गुजरात में भी भूमि रैयती गा¡व` और जमींदारी के तालुका` में बंटी हुई थी। जमीदंार अपने पास रख लेता था और रैयती बा¡ट कहा जाता था, अपने राजकोष में जमा करता था। रेयती गांवों पर भी अतिरिक्त् कर (खिराज) लगने लगे और अपना प्रभुत्व बढ़ाने लगे।

बंगाल में जमींदार, गा¡व के किसानोंं से अलग-अलग कर वसूल करते थे, लेकिन राज्य को निर्धारित कर ही देते थे। जमींदार के हक को `मालिकाना´ कहा जाता था। मालिकाना जमींदार को दिया जाता था। साधारणत: जमींदार को यह नकद दिया जाता था, लेकिन कभी-कभी इसके बदले भूमि भी दी जाती थी। इस निर्धारित आय के अतिरिक्त जमींदार अपने इलाके किसानों से तरह-तरह के कर वसूलता था, जैसे - दस्तारशुमारी (पंगिड़यों का गिनती), विवाह कर, मृत्यु कर, गृह कर (खानाशुमारी) आदि-आदि। जमींदार निम्न वर्ग के लोगों से बेगार लेता था। बलाहार, थोरी, धानुक और चमार को अपने जमींदार के लिए पथ-प्रदर्शक और बोझज्ञ ढोने का काम करना पड़ता था। इतना ही नहीं, जमींदार की जाति के जितने भी लोग उस तरफ से गुजरते थे, उनके लिए भी उन्हें बेगार करनी पड़ती थ्ीा। जमींदार की निर्धारित आय और अतिरिक्त आय का ठीक-ठाक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। अठारहवीं शताब्दी में बंगाल और देहली के आसपास जमींदारों को अतिरिक्त लाभ उस क्षेत्र की वािर्षक आय का चौाथाई भाग निर्धारित किया गया था जसे `सायर चौथ` कहा जाता था।

मुगल काल में खालसा भूमि में `परगना` जैसी प्रशासनिक इकाई नहीं होती थी, मात्र सूबा, सरकार व महल इकाइया¡ थीं। `सरकार` के अधीन `महल` आते थे, न कि परगने। आइने-अकबरी में सरकार अलवर में 43 महल, सरकार तिजारा में 18 महल और सरकार बयाना में महल का उल्लेख नहीं हुआ है टोडाभीम खालसा भूमि होने के कारण अकबर काल में सरकार आगरा के अधीन था। (आइने-अकबरी पृष्ठ 192-203)। टोडाभीम में टाअड़द्य गूजरों के होने का जिक्र भी आइने-अकबरी में हुआ है। ये टाअड़ गूजर क्या आज भी हैं? मीणाओं में टाटू और टाटड़ गोत्र होता है क्या इनमें कोई सम्बन्ध है? अकबर का इतिहासकार बदाऊनी टोडाभीम का ही रहने वाला था। टोडाभीम में ता¡बे की खान होने का उल्लेख भी आइने-अकबरी में हुआ है, परन्तु खर्चीली मानकर उसका उत्खनन नहीं किया गया।

सवाई माधोपुर गजेटियर में लिखा है कि जयपुर के संस्थापक महाराजा जयसिंह के भाई विजयसिंह को सन् 1710 में टोडाभीम और हिण्डौन की जागीर देकर आमेर का झगड़ा शान्त किया गया था। टोडाभीम, वजीरपुर, हिण्डौन, मडौल खालसा भूमि थी और आगरा सूबा के अधीन थे, जबकि बौंली, आलमपुर, खण्डार आदि अजमेर सूबा में शामिल थे।

इससे तो यह लगता है कि सन् 1710 के बाद ही टोडाभीम विजयसिंह को जागीर में मिला। मनीराम मीणा द्वारा जोरवाल मीणाओं को सामन्त या जागीरदार मानना हृदयगम नहीं हो पाया। जमींदार संगठित होते थे और सेना भी रखते थे। अबुल फजल ने आ¡कडत्रे प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि मुगल साम्राज्य के जमींदारों की सेना 44 लाख थी। जमींदार अपनी सम्पत्ति की सुरक्षा के लिए किले बनाने लगे। कभी-कभी किसी गा¡व में एक पक्ष द्वारा किले के बनाये जाने और प्रतिपक्ष द्वारा उसे नष्ट किये जाने का विवरण मिलता हैं प्रशासन को इस प्रकार के झगड़ों की खबरें बराबर मिलती रहती थी।। जमींदारों की अधिकार की सुरक्षा में जाति की भूमिका प्रमुख थी। इससे अनुमान लगाया जाा सकता है कि जमींदार अपनी सेना के लिए अपनी ही जाति के विश्वसनीय सैनिकों का चुनाव करता था।

जमींदार की सेना में अधिकतर गा¡व के अनपढ़ और अनागढ़ लोग होते थे जिनका उपयोग व क्षेत्रीय संघर्षों में या प्रतिपक्ष को दबाने में करता था। फरीद (आगे चलकर शेरशाह) ने बिार में अपने पिता की जागीर के विद्रोही जमींदारों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की। ऐसा समझा जाता है कि ुरीद ने जिस गा¡व पर आक्रमण किया, वहा¡ के सभी लोगों को जान से मार डाला और वहा¡ नये किसानों को ले जाकर बसाया। ऐसा इसलिए किया कि सभी पुराने किसान या तो जमींदार की सेना के सिपाही थे या उसके समर्थक। इस प्रकार एक वर्ग के रूप में जमींदार आपस में विभाजित थे। वे जातीय और क्षेत्रीय बन्धनों में ब¡धे हुए थे।

जयपुर महाराजा समय-समय पर मीणा जमींदारों से सैनिक सहायता लेते रहते थे। मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और उससे भी आगे दक्षिण में अधिकतर मीणों का निष्क्रमण जयपुर महाराजा के सैनिक अभियानों के दौरान ही हुआ था। वहा¡ उन्हें जमींदारिया¡ प्रदान कर बसाया गया था और इसी कारण वे वहा¡ `परदेशी राजपूत` कहलाने लगे थे। यह सब इतने विस्तार के साथ इसलिए लिखा गया है कि टोडाभीम परगने में जोरवाल मीणा जमींदारी का अस्तित्व हृदयगंम हो सके।

टोडाभीम और बामवास क्षेत्र के मीणां जमींदारों के शक्ति-प्रदर्शन के अनेक किस्से सुनने को मिलते हैं। गंगािंसह द्वारा लििाख्त `यदुवंश` (प्रथम भाग) में बामनवास के मीणा सरदार का जिक्र है जो अपने क्षेत्र का मुखिया था। उसने अपने इलाके का लगान जयपुर दरबार को नहीं चुकाया और घोषणा कर दी- `जो उसे मल्लयुद्ध में हरा देगा, उसे वह लगान देगा। महाराज यदि लगान वसूली को भेजते हैं तो किसी अकेले को भेजें जो मुझे मल्लयुद्ध में हराकर लगान ले जाये।` सन् 1756 के आसपास भरतपुर राज्य के पथैना के ठाकुर अजीतसिंह तत्कालीन भरतपुर नरेश से मनमुटाव के कारण जयपुर आ गये। बामनवास के मीणा सरदार को अजीतसिंह ने मल्लयुद्ध में पराजित किया। महाराज जयपुर ने खुश होकर बामनवास की सवा लाख की जागीर अजीतसिंह के नाम कर दी। लेकिन सात साल बाद अजीतसिंह अपने गृह राज्य में लौट गये।

अलवर जिले की थानागाजी तहसील के गा¡व हमीरपुर में लाला नीमवाल द्वारा निर्मित तीन चौक की हवेली और घुड़साल देखने से पता चलता है कि अठारवीं सदी में जयपुर रियासत में शक्तिशाली मीणा जमींदार थे। मीणों के अनेक बड़े-बड़े गा¡वों में मीणा सरदारों के पास रह¡कड़ा, रामचन्दी (छोटी तापें) तथा तोपें रहती थी।। कुछ गा¡वों के कब्जे में आज भी ये देखी जा सकती हैं।

भगवान अद्युतानन्द गिरि द्वारा सन् 1942 में लिखित बारा मेवाशियों का संक्षिप्त इतिहास में टोडाभीम के जोरवाल (जुणवाल) तथा बामनवास के लोदवाल मीणों के सम्बन्ध में लिखा है - `जुणवाल मीणा राजपूत निजामत हिण्डोन के परगने में मशहूर हैं। पहले जमाने में राजा की तरफ से काफी मुर्तबा हासिल कर चुक हैं जो खानदान के बगदाव में मशहूर है। ।`

`बामणोस में लोदवाल काराडे (का¡टिया) गोत के मीणा राजपूत रहते हैं और इनको भी राज की तरफ से अच्छे मुर्तबा में शामिल किये जाते हैं। पा¡च नाम के गोत के मीणा राजपूतों को बादशाही जमाने से पालकी कडवाई की मंजूरी हुई।

टोडाभीम पर कछवाहों के आधिपत्य से पूर्व, प्रचलित किंवदन्ती के अनुसार उस पुराने जमाने में टोडाभीम 300 खेड़ाओं (गा¡वों) की राजधानी थी और तब टोडाभीम का जोरवाल मीणा मुखिया उन 300 खेड़ाओं से चौथ वसूल करता था - जोधा, शहर टोडा बैठ्यो, तीन सौ खेड़ा की चौधराहट लीन्हीं। तीन सौ तिलक टोड़ो बण्यो, कलसड़े कामन्ना भेंट आयी। (सौजन्य : हरसहाय जागा, टोडाभीम)

इस तथ्य को पुराने लोग आज भी छाती ठोककर उजागर करते रहते हैं कि सिकराय-टोडाभीम-निठार के बीच का लगभग 40-50 किलोमीटर का क्षेत्र पुराने जमाने में जोरवाल मीणाओं के अधीन था। सिकराय के जोरवाल मीणा परिवारों के लोगों को आज भी जागीरदार पदवी के साथ सम्बोधित किया जाता है। सिकराय का श्यामा जोरवाल, टोडाभीम का जोधा और ऊदा जोरवाल तथा निठार का रीठा जोरवाल अपने समय के अत्यन्त प्रभावशाली व्यक्ति थे। `कुआल का पुरा` का जयकिशन चौधरी और जिन्सी का पुरा का जिन्सी चौधरी टोडाभीम के प्रसिद्ध चौधरी थे। टोडाभीम तथा अन्य स्थानों पर राजपूतों का प्रभावशाली नियंत्रण हो जाने पर राजपूत शासकों ने चौथ वसूली के लिए प्रभावशाली जोरवाल मीणा सरदारों को अपने-अपने क्षेत्र में चौधीर की सम्मानित पदवी प्रदान की। टोडाभीम का चौधरी हाथीबन्द था। अपने इलाके में जाने के लिए हाथी की सवारी का इस्तेमाल करता था। चौधरी को पलाकी भी मिली हुई थी। कचहरी में जाने के लिए वह पालकी का इस्तेमाल करता था। हाथी और पालकी का सारा खर्चा राज्य के जिम्मे था। टोडाभीम में :आमिल´ नामक पदाधिकारी रहता था। वह जयपुर महाराजा के प्रतिनिधि के रूप में इस क्षेत्र के लगान सम्बन्धी कायोZं को देखता था। सन् 1693 के आसपास जयपुर नरेश बिशनसिंह द्वारा टोडाभीम में नियुक्त आमिल का नाम चूड़ामलदास था।

जब-जब भी किसी आमिल या जागीरदार ने इस क्षेत्र के जोरवाल चौधरी के अधिकारों को कम प्रयास किया, तब-तब जोरवाल चौधरी अपने भाई-बन्धुओं की सहायता से उनके खिलाफ संघर्ष छेड़ देते थे। एक ऐसी ही खींचातानी में गज्जू जोरवाल के पुत्र मालदे ने अपने साथियों को लेकर अपने क्षेत्र के ठाकुर के गढ़ को घेर लिया। इस संघर्ष में इाकुर हार गया। मालदे ने उसे पकड़ लिया और सब मिलकर उसके लिए सजा तजबीज करने लगे। गम्भीर स्थिति देखकर ठकुरानी बाहर आई और मालदे से ठाकुर के प्राण-रक्षा की गुंहार की। इसके ऐवज में ठकुरानी ने मालदे की दासी तक बनना स्वीकार कर लिया। इस सम्बन्ध में निम्न पद्य प्रचलित है - तरकश कछनी का¡छ के चार वाल घेरी। अबके बखस दे गज्जू के मालदे, मैं चरणन की चेरी (सौजन्य : हरसहाय जागा, टोडाभीम)

मीणा राजपूत सिकराय, टोडाभीम हिण्डौन और बामनवास सहित समूचा पचवारा क्षेत्र पुराने जमाने में मीणाओं का गढ़ रहा था। इस क्षेत्र के प्रशसन पर कछवाहों की पकड़ बड़ी मुश्किल से हो पाई थी। उससे पहले इस लम्बे-चौड़े इलाके पर एकछत्र मीणाओं का वर्चस्व रहा था। तब और उसके बाद तक मीणाओं का यहा¡ राजपूत कहा जाता था, राजपूत माना जाता था और राजपूत बताया जाता था (मीणा राजपूत)।

टोडाभीम के जोरवाल मीणा जमींदार को शासक-प्रशसक की सारी शक्तिया¡ प्राप्त थीं, जैसे दीवानी, फौजदारी, मालगुजारी, पदनाम (रावत या चौधरी), निशान, नक्कारे आदि-आदि। बादशाह अथवा महाराजा की ओर से उन्हें वर्ष में दो बार नियमित रूप से शिरोपाव (पगड़ी) और भेंट मिलती रही थी जो उनके सामन्त होने का साफल सबूत है। (सन्दर्भ : विभिन्न पुस्तकों में आये छूट-पुट विवरण, इस क्षेत्र में प्रचलित जनश्रुतिया¡ और जागाओं की पोथियों में दर्ज विवरण)।

Population

Distribution

टोडाभीम, सिकराय, टोडाभीम हिण्डौन और बामनवास दौसा जिले का अलियापाड़ा ग्राम और उसके आसपास के 12 ग्राम जारवाल मीणा गोत्र के है

Notable persons

References



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