दापा

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प्राचीन काल में विवाह से पहले कन्या का मूल्य लेने की परंपरा थी जिसे दापा या चारी कहा जाता था । कमजोर आर्थिक स्थिति वाले माँ-बाप रूपये लेकर अपनी कन्या का विवाह करते थे । उस समय कन्या को बोझ नहीं समझा जाता था । दक्षिण राजस्थान में यह कन्या-विक्रय का कार्य दापा व दक्षिण-पूर्व राजस्थान में चारी के नाम से जाना जाता था । परंतु बर्तमान में शिक्षा एवं दहेज़ के कारण मीणा जाति में ये दोनों प्रथाएं समाप्त होती जा रही हैं ।