दुला धाडी

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Author of this article is पी एन बैफलावत

भारत के मध्यकालीन इतिहास में दुला धाडी एक प्रसिद्द धाडवी और स्वतंत्रता प्रेमी आदिवासी हुआ जिसने मुगलों को चुनोती दी वीरता और निडरता उसकी रग रग में थी | दुला के दादा को घाट के कोट में जीवित चुना दिया, परदादा की खाल खिचवाई,,मांस चीलों को लुटवाया था और पिता को जिन्दा जमीन में गाड़ दिया गया था | देशप्रेम उसके रक्त और हृदय में था जो नामवर काम करने की प्रेरणा देता था अपने कार्यो और संघर्ष से दुल्ला जन जन के दिल में बसता है सेकड़ो साल बाद भी उसकी दिलेरी और वीरता के लोकगीत आमजनो में लोकप्रिय है | भोपा, जोगी, और मीणा लोक गायक उनके कारनामो के गीत गाते है |

मीना आदिवासी पपलाज माता के जस गाते समय व चड़स झेलते हुए ‘’भारया’’ के रूप में उनके लोग गीत गाते है उनका एक गीत आपके लिए प्रस्तुत है :-

दो तो ले ले डांगरा,नुवो कटा ले बाढ़ सुबो (हासिल) भरज्यो राज मै,सुखभर नींद काढ ||

न तो ल्यूं डांगरो,न कटाऊँ नुवो बाढ़ | न भरूं सुबो, न सोऊ सुखभर नींद काढ ||

फर फर लुटू सेठ साहूकार और तुर्क फौंजा, या जन्म भोम म्हारी,पुरखा के चालूं खोंजा ||

करूँ आजाद ल्यूं बदलो नरभय करूँ फैर ठाठ | फैर सोऊ सुखभर नींद ढार चौबारे खाट ||