पदिया मीणा

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Author of this article is [|पी एन बैफलावत]

मीना आदिवासी राबिन वुड मारवाड़ का पदिया मीना


मीना समुदाय की छापामार युध्द निति, दिलेरी बहादूरी असाधारण कार्य करके नाम कमाने की प्रवृति बहुत बढ़ गई थी । इनको दबाने के लिए अंग्रेजो को सुपरिन्टेन्डन्ट ऑफ मीणा डिस्ट्रिक्ट बनाना पड़ा,नसीराबाद छावनी, मेरवाड़ा मे मेर बटालियन,खैराड़,मेवाड़,बागड़ एवं गोड़वाड़ के मीणोँ को दबाने के लिये अंग्रेजो को क्रमशः देवली,खेरवाड़ा,कोटड़ा, नीमच,ऐरिनपुरा और शिवगंज मे विशेष छावनियां स्थापित करनी पड़ी । यह समुदाय अंग्रेजो को बाहर निकालने का पक्षधर था दुर्भाग्य यह रहा कि स्थानीय शासकों ने इनकी सहायता करने के बजाय इनका दमन किया । मारवाड़ के गौड़वाड़ मे मीणा अपनी प्रतिकात्मक स्वतंत्र सत्ता कायम कर रखी थी अपने परगने और उनके स्वतंत्र सरदार या प्रमुख बना रखे थे । बहादूरी और दिलेरी की बहुत सी गाथाये आज भी मारवाड़ मे सुनने को मिलती है वे विदेशी शासन व सामन्तवाद के कट्टर शत्रु थे उनकी शौर्य पूर्ण गाथायें आदिवासी लोकगीतों मे मिलती है | कर्नल जेम्स टॉड ने इस क्षेत्र के मीणों की वीरता और जीवन की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है । उसने इस क्षेत्र को रोमांचक गाथाओ का विपुल भंडार बताया है |

किसी शक्तिशाली व्यक्ति,रियासतों,जागीरदारों,या मुग़ल या अंग्रेज सरकार या उनके कारिंदों के शोषण और अत्याचारों से आदिवासी समाज की रक्षा के लिए आदिवासी युवा हथियार उठा लेते थे |यह उनके दृष्टिकोण से हक़ अधिकार और देश की आजादी के लिए संघर्ष था |सच कहा जाय तो ये लोग जन साधारण के लिए मसीहा, हमदर्द, हितेषी और विदेशी शासन को उखाड़ फैकने वाले स्वतंत्रता प्रेमी, जनभक्त, देशभक्त,और स्वतंत्रता सेनानी थे | राजस्थान के इतिहास प्रसिद्द बागी या डकैत :-बाबा घाटमदास, बाबा जोधा भक्त, दल्ला रावत ,हामजी भराजा खराड़ी, भुवाना पटेल, गोकुला पटेल. देवा मीणा, बलवीरा, गुलाबा मीना ,गोगा गमेती, दुला धाडी, पदिया मीना भद्रजुन, घेटिया, टीमला, इन्दा, वालिया,सावंता मीना, करणा मीना, रंजीता मीना, लाल्या संड्या, धुला मान्दड, जमना मीना, सुजा मीना, लादिया मीना थे |इनमे से मीना आदिवासी राबिन वुड मारवाड़ (सिरोही) के पदिया मीना का परिचय कराना उचित होगा – पदिया मीना का जन्म 1836 में मारवाड़ के सिरोही क्षेत्र के एक गाँव में हुआ । बचपन से ही वह समाज के प्रति जागरूक था उसे ये भी पता था की उसके पूर्वज सम्पूर्ण मारवाड़ के कबीलाई शासक थे । इसलिए उसने 13 वर्ष की अल्प आयु से ही बगावत का बिगुल बजा दिया उसे बागी नाम दिया गया । जमीदार,सामंत और अंग्रेज थानों को लूटना प्रारम्भ कर दिया लेकिन यह लुट कार्य अपने लिए नही बल्कि अंग्रेजो और सामंतो से शोषित जनता के भले के लिए करता था । जो बाद में बागियों में शिरोमणि बन गया और लोगो ने उसे अपना रोबिन हुड मान लिया । जो अमीरों से लूट कर गरीबो में बाटने का काम करता था । इसलिए पदीया विख्यात डाकू/बागी था । एक बार उसके द्रांगडा ने एक बार व्यापारी सेठ समझ बंजारा को लुट लिया 6000 रुपये प्राप्त हुए पता चलने पर 60 रुपए बोलवा ले बाकी रूपये उसके परिवार के लिए लौटाते हुए कहा मै इन गरीबों को दुखी नहीं देखना चाहता अतः वह रहम दिल भी था डाका डालने वाला डकैत नहीं था वरन् एक बागी था जिसने संकल्प लिया था कि विदेशी सत्ता और उसके सहयोगियों के पांव उखाड़ना है।

वह युवाओं के लिए एक जननायक का काम कर रहा था। लेकिन इस से मारवाड़ व् अन्य आस पास के सामन्तो और अंग्रेजो की नींद हराम हो गयी थी । लेकिन उसे पकड़ पाना ना मुमकिन था । क्योंकि वह एक पल में यहा होता तो दुसरे पल कहीं और लोग उसकी इस फुर्ती के कायल थे । वह अकेला ही भेष बदल कर घूमता था । कभी साधू कभी कुली एसे भेष बदलने में वह बहुत तेज था और ताकतवर इतना कि 30 लोगो से अकेला मुकाबला करने में सक्षम था मारवाड़ अंचल की गीत- गाथाओं में आज भी पदिया को याद किया जाता है। घेटिया, टीमला, ईंदा और बालिया मीणा भी दिलेर और शुरवीर थे रियासती फौजो और स्थानीय सामन्तो को चुनोती देते रहते थे उनके खजाने लुटकर जनता मे बाटते थे अनाज के गोदाम लुट कर जनता मे बाट देते थे गरीबो की हर प्रकार से मदद करते और शोषक सामन्त और सेठ साहुकारो को लुटते थे ।गोडवाड के मीना बागियों के सम्बन्ध में यहाँ के गाँवो में एक कहावत चली आई है ‘धणी री वाली नै, लारो भाखर नै, खियल रा मुथा नी वैता तो गोडवाड री बनियानिया सोने रे घड़े से पाणी भरती अर्थात अगर धणी गाँव की छोटी नदी,लारा भाखर की गुफाएं (मेवासा) और खियल गाँव के मेहता मुथा नहीं होते तो गोडवाड के बणीयो की औरते सोने के घडों से पानी भरती | धणी नदी जो नहर की तरह गहरी होने से बागी गिरोह के आने जाने का मुख्य मार्ग थी लारा भाखर की गुफ़ाए उनके रहने का गुप्त मेवासा था | एक कहावत और प्रसिद्द है ‘मेंणा रो बैर रे सौ साल सड़ो नी लागै ...अर्थात मीनों की दुश्मनी सौ साल से भी ज्यादा समय तक चलती है उनकी अगली पीढ़ी बदला चुकता करती है | पूरा मारवाड़ उनके नाम से कांपता था । धाडैती की टोली को द्रागडा कहते थे | टोली का कोई सदस्य मारा जाता तो दुसरे साथी गाँव में आकर उसके घर के सामने एक तीर गाड़ देते इस संकेत को घर वाले समझ जाते थे रोना धोना कम ही होता था अगर औरते रोती भी तो उसकी वीरतापूर्ण कार्यो का बखान करती थी जैसे –थारी कणिया को कटारो कोण बांधेगो,थारो छोगलो पोतियों कोण बांधेगो, थारा कमठा और तीर कोण रान्खेगो ?”

करांतिकारी पदिया पकड़ने के लिए सन 1852 में अंग्रेज और जोधपुर महाराजा प्रताप सिंह दुवारा सेना की टुकड़ी तैयार की गयी थी सिरोही के फौजदार नाथू सिंह ने उसके साथी बालिया को लालच देना चाहां पर वो तैयार नहीं हुआ | दबाव बढ़ने पर पदिया गुजरात चले गया |फिर वापिस आ गया सिरोही में गंगला की माँ संकट के समय उसे खाना पहुँचाया करती थी एक पदिया का साथ रामहिला बीमार हो गया किसी ने राज को खबर पहुंचा दी रियासती पुलिस पहुच गई मुटभेड में बांह पर गोली लगी पर पदिया वहां से भी सुरक्षित निकल गया | 1857 की स्वतंत्रता क्रांति में पदिया ने स्वतंत्रता सेनानियों की भरपूर मदद की | वह पुलिस और रियासती फ़ौज को निरंतर चकमा देता रहता है | पुलिस के सारे उपाय विफल हो गए व विविध वेशो में समस्त मारवाड़ में विचरण करता हुआ शोषित वर्ग की सहायता करता रहता था और अपना पीछा करने वाली रियासती पुलिस और फ़ौज को कुत्ता कहता था बैडोल व कुरूप लंगड़ा, काणा होते हुए भी अत्यंत बल संपन्न और एकाक्ष शरीर का उत्साह में भरपूर अन्तसाल की मौलिकता का साक्षी था एक बार फ़ोर्स से लुटी हुई बन्धुक को लेकर साथी टीमला और पदिया में मतभेद हो गया | पदिया को पता चला कि जोधपुर महाराजा प्रताप सिंह ने अंग्रेजो से मिल पक्का इंतजाम कर रखा है मारवाड़ से देवली (टोंक) चले गया कुछ समय बाद मारवाड़ के गाँव अनघोर आकर रहने लगा उसे 35 वर्ष बाद सफलता मिली और उसे धोखे से सोते हुए गोड़वाड़ के गांव अणघोर मे से हाकिम मेड़तिया जुझार सिंह ने बन्दी बना लिया गया और जोधपुर दरबार के सामने पेश किया बताया जाता है की पुलिस को ये सुचना उसके ही साथी ने लोभ में आकर दी । लेकिन तब तक उसकी उम्र 52 वर्ष की हो गयी थी और अगस्त 1887 में उसे गिरफ्तार किया गया और नवम्बर 1887 में जोधपुर में फांसी की सजा हुई ।

उसकी माँ भी वीरांगना थी क्योंकि जब उसकी माँ को उसकी गिरफ्तारी के बारे में मालूम हुआ तो वो दुखी होने की बजाय गुस्से में हो गयी । उसको खजाना लुटने,रियासती सैनिको को मारने सामन्तो व राजा से विद्रोह के अपराध मे फांसी की सजा दी गई । तब उसकी मां मिलने गई मां ने कहा तू ने मेरा दुध लजा दिया मैने तुझे नामर्द की तरह मरने के लिये पैदा नही किया था तू शुरवीर की तरह लड़कर मरता तो मुझे गर्व होता । तब पदिया बोला मां मै धोखे मे पकड़ा गया नही तो इन राजपूतो और राज को बता देता मीणा क्या होता है अब तो बात अगले जन्म पर गई पर परमेश्वर मुझे अगले जन्म मे भी मीणा ही पैदा करे मै इन्हीँ पहाड़ों मे जन्म लूँ और फिर ऐसी ही बहादूरी और नामवरी के काम करुँ ।

बताया जाता है मौत से पहले पदीया की आँखों में मौत का डर बिलकुल नही था । वह मौत से पहले जेल में खूब नांचा और गाया । उसे अपनी मौत का डर नही था बल्कि उसे उसके कामो पर गर्व था । अंत में जब मौत की घडी के समय जब अंग्रेज उसको फ़ासी का फंदा लटकाने में डर रहे थे तब पदिया ने स्वयं हँसते हुए गले में फ़ासी के फंदे को डाला और वीर गति को प्राप्त हुआ ।और उसकी माँ ने कहा -" मुझे मेरे बेटे पर गर्व है । मैं हर जन्म में अपने बेटे की माँ बनना चाहुगी |

संदर्भ सूचि:-

1-रिपोर्ट –मरदुमशुमारी राज मारवाड़ 1891 ई० –जिल्द-3 पृष्ट-122,124

2-राजस्थान की जातियां –बजरंग लोहिया 1954 पृष्ट-44

3-मीना इतिहास –रावत सारस्वत -1968 पृष्ट- 52,53

4-लादूराम मीना तख्तगढ़ जोधपुर से वार्ता

5-जागा-बही