बद्री नारायण खोरा

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बद्री नारायण खोरा

श्री बद्री नारायण खोरा जी स्वतंत्रता सेनानी और निस्पृह लोकसेवी श्री बद्री नारायण खोरा का ग्रामीण जनता की सेवा के लिए समर्पित भावना पीढ़ी के लिए सदा प्रेरणा का स्त्रोत रहेगा | पद प्रतिष्ठा और प्रचार से कोसों दूर रहते हुए, अपनी मान्यताओं के अनुसार जेसा जीवन उन्होंने अपनाया, वैसा उदाहरण विरले ही लोगों का है | सर्वोदय नेता श्री सिद्धराज ढडढा का कथन इस संदर्भ में उल्लेखनीय है खोरा जी उन लोगों में से थे, जो प्रत्येक श्वास के साथ परामर्श की बात सोचते थे | व्यक्ति आता है और चला जाता है, समाज सरिता निरंतर बहती रहती है | खोरा जी ऐसे ही त्यागी पुरष थे, जो अपने व्यक्तित्व की अनूठी छाप लोगों पर छोड गये | "

ऐसे तपस्वी सेवा भावी खोरा जी का जन्म तत्कालीन खोरा गाव में 26 सितम्बर 1900 को हुआ | उनके पिता श्री गिरधारी लाल रेलवे विभाग की सेवा में थे | नवी कक्षा वे महाराजा स्कूल में पढ़े | पारिवारिक परिस्थितियों के कारण चाहते हुए भी वे आगे न पढ़ सके | पढाई छोड़ने के बाद कुछ कुछ समय नौकरी करते रहे | इसके बाद वे गोविन्दगढ़ अध्यापन तथा रींगस में खादी के कार्य में लग गये | 1923 में उनकी भेंट प्रसिद्ध क्रांतिकारी श्री अर्जुनलाल सेठी से हुई | इससे उनका चिन्तन ही बदल गया और देश सेवा की प्रतिज्ञा कर जन सेवा में लग गये | 1935 में खोराजी प्रजामंडल के अध्यक्ष श्री हीरालाल शास्त्री के संपर्क में आये और वे शास्त्री जी को फक्कड़ मंडली में सम्मलित हो गये | जीवन कुटीर एवं प्रजामंडल के कार्य में वे निरंतर व्यस्त रहे |

विदेशी शासन तथा देशी राजाओं के विरुद्ध लोकमत जागृत करने में निडर होकर काम करते रहे | इसके लिए सामन्तवादी शासन से लोहा लेना पड़ा | जयपुर रियासत द्वारा जरायम पेशा कानून के अंतर्गत आदिवासी मीणा जाति पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध मीणा समाज को प्रबल प्रदान किया और उनके सम्मेलनों में भाग लेने लगे और सरकारी दमन चक्र की खुलकर निन्दा की | सामन्ती शासन के विरोध एवं पिछड़ी जातियों के लिए लड़ने के कारण आपका जीवन कितनी बार खतरे में पड़ गया | परन्तु आप अपने ध्येय से कभी विचलित नही हुए और निरंतर संघर्ष करते रहे |

अपने अपमान व सामाजिक बहिष्कार की चिन्ता न करते हुए वे निडर होकर समस्त ढूंढाड़, तोरावाटी, शेखावटी क्षेत्र में स्वतंत्रता की अलख जगाते रहे | खोराजी के जीवन की विशेषता थी उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नही था | जिस काम को वो हाथ में लेते वे पूरा करके छोड़ते थे | विपदाओं तथा विरोध उनके कार्य में कभी बाधक नही होते थे | वे अपनी धुन के पक्के थे | उनकी मान्यता थी कि सामाजिक क्रांति के बिना राजनीतिक क्रांति का कोई मूल्य नही है | अतः समाज सुधार के कार्य को अपने हाथ में लिया |

सन 1929 में गांधीजी की प्रेरणा से अपने गाँव खोरा-बीसल में हरिजनों में शिक्षा प्रसार को अपने हाथ में लिया | हरिजनों की सेवा के कारण उनको जाति से बहिष्कार होना पड़ा | गांधीजी को जब घटना का पता चला तो उन्होंने खोराजी के साहस की प्रशंसा की उनको प्रेरणादायक पत्र लिखा | 1937 में प्रजामंडल आन्दोलन में भाग लेते हुए उन्होंने रियासती शासकों के शिकार कानून का विरोध किया और कृषि की रक्षा के लिए, सूअर, भालू मारने की छूट दिलवाई | ठिखानेदारों को तो वे गुलामों के गुलाम कहा करते थे | सत्याग्रह आन्दोलन में वे भूमिगत रहकर सामन्तवादी का विरोध करते रहे | मार्च 1945 में जागीदारों का गढ़ घोड़ा पूंख में जहां खादी की टोपी या तिरंगा ले जाने पर आदमी जिन्दा नहीं आ सकता था, उस जगह सम्मलेन रखा गया और उस सम्मलेन का आयोजन लक्ष्मीनारायण झरवाल ने किया और उसके प्रचार के सिलसिले में उनको नीमकाथाना की पुलिस ने गिरफ्तार किया और जेल भेज दिया | इसी प्रकार दूदू में जागीरदार दुवारा खोरा जी जब जाते थे तो गांव के किसानों से उनको नहीं मिलने दिया जाता था | वहां विशाल सम्मलेन का आयोजन खोरा जी सभापतित्व में किया गया और किसानों को लाग- बाग न देने की घोषणा की गई |

1947 में देश स्वतंत्रत हुआ, खोराजी की अभिलाषा पुरी हुई | इसके बाद अपनी जन्मभूमि के विकास के कार्य में लग गये | अपनी सेवा भावना के कारण वे खोरा बीसलपुर के वर्षो तक सरपंच रहे | भारत सेवक समाज के मुख्य प्रचारक बन गये | ' बद्री नारायण ' और खोरा इतने एकाकार हो गये कि वे खोराजी के नाम से ही पुकारे जाने लगे | 86 वर्ष की अवस्था में 28 जनवरी 1986 को इस कर्म योगी ने अंतिम सांस ली और वे लोगों पर अपनी अमिट छाप छोड़ गये |

संदर्भ