मांच का द्वितीय युद्ध

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मांच के प्रथम युद्ध में राव नाथू काम आ गया था । उसका पुत्र [राव मेदा]] किसी प्रकार युद्ध से भाग निकला था । मीन पुराण के अनुसार राव मेदा अब गाँव-गाँव में जाकर अपने मीणे साथियों को संघठित करने में जुट गया था । उनको संघठित कर राव मेदा ने स्वयं को शक्तिशाली बना लिया था । अपने ओजस्वी भाषणों के माध्यम से वह मीणा जाति में नवीन उत्साह की अपूर्व लहर सृजित कर उन्हें दूलहराय से अपनी पूर्व पराजय का बदला चुकाने हेतु संघर्ष के लिए तैयार करने लगा । अपने इस भ्रमण व ओजस्वी  भाषणों से मीणासमाज में उसने अपने को एक महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली व्यक्ति बना लिया था ।

एक दिन जब वह एकत्रित मीणा जनजाति के वीर योद्धाओं को युद्ध के लिए संबोधित कर रहा था तो बीच में ही एक मारण वीर ने कहा: "मीणा समाज की रक्षा हेतु आपका निर्णय अनुपम है । परंतु युद्ध करने के लिए हमारे पास पर्याप्त युद्ध सामग्री तो है ही नहीं ।" सामरिक-सामग्री के अभाव में हम अपने शत्रु पर विजय किस प्रकार प्राप्त कर सकेंगे ?" मारण के ये वचन सुनकर राव मेदा ने अपने एकत्रित साथियों को धैर्य बंधाते कहा कि "सरदारो यह हमारे साहस की घड़ी है । यह संघर्ष हमारी वीरता की कसौटी सिद्ध होगा । हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए । यदि इस अवसर पर हम साहस नहीं जुटा सके और हिम्मत-पस्त हो गए तो आगे आने वाली पीढ़ियाँ हम पर हसेंगी । हमें लज्जित करेंगी । स्वाधीनता खोकर जीवित रहने से तो मर जाना ही अच्छा है । यद्यपि इस दुर्ग में मेरे पिता नाथूराव, उनके पिता भौणराव, उनके पिता जयरासीराव, उनके पिता बीसाराव और उनके पिता आसाराव का धन संचित है । वह धन इतना है कि उससे हम 23 हज़ार सैनिकों की सेना तैयार कर सकेंगे । अतः यदि आप सहायता दें तो में यहाँ खाद्य पदार्थों व शस्त्रों का ढेर लगा दूंगा । साथियो यह अपने धर्म का युद्ध है । इसमें विजयी होने पर स्वर्ग मिलेगा । भला मृत्यु से क्या डरना ? एक दिन मरना सबको है । पशु-पक्षी भी अपनी स्वतंत्रता के लिए प्राण न्यौछावर कर देते हैं ।अतीत काल से मत्स्य देश हमारा है । हमारे यहाँ आने से पूर्व यह प्रदेश वीरान पड़ा था ।फिर हम खटिया पर पड़े-पड़े गुलामी के जीवन में कराहते क्यों मरें ? इससे तो एक स्वाधीन क्षत्रिय की भाँति अपनी मातृ-भूमि की स्वतंत्रता जी बलि-वेदी पर अपने को भेंट कर देना श्रेयकर व जीवन को सफल बनाना होगा ।

जब दूलहराय को राव मेदा की सैनिक तैयारी का पता चला तो वह भी अपने चार हज़ार सैनिकों को लेकर युद्ध करने आ गया । कतिपय मध्यस्थ सरदारों ने दूलहराय को युद्ध न करने की मंत्रणा दी और कहा महाराज जिन परगनों को आपने हम लोगों के खून को पानी की तरह बहाकर प्राप्त किया है, आप उन पर ही संतोष कर लें । युद्ध-भूमि से लौट चलें । परंतु दूल्हाराय को अपनी शक्ति पर गर्व एवं विश्वास था और इसके साथ ही वह छल-कपट की नीति में भी निपुण था । राव मेदा की सैनिक तैयारी देखकर [दूलहराय]] ने युद्ध की नीति का त्याग कर छदम नीति से विजय प्राप्त करने की सोची । दूलहराय ने मीणा सरदारों से कहा कि मैं युद्ध करने नहीं आया हूँ वरन कुलदेवी के दर्शन करने आया हूँ । आपके अनुरोध पर मैंने युद्ध करने का इरादा त्याग दिया है । आप मुझे जमवाय माता के दर्शन करने की अनुमति दे दें ।

भोले मीणा सरदारों ने कछवाहा नरेश दूलहराय के वचनों पर विश्वास कर उसे देवी दर्शन की अनुमति प्रदान कर दी । उसे मीणा सैनिकों के मध्य से देवी के मंदिर में जाने का रास्ता दे दिया । दूलहराय ने योजनाबद्ध तरीके से मीणा सरदारों पर धावा बोल दिया । दूलहराय के विश्वासघात पर मीणों को बड़ा क्रोध आया और वे मांच की स्वतंत्रता के लिए कछवाहा नरेश के सैनिकों पर टूट पड़े । दोनों ओर से भयंकर युद्ध लड़ा गया । दूलहराय को उसकी कृतघ्नता का सबक सिखाने की नीयत से मीणों ने राजपूत सैनिकों को निर्दयता से मौत के घाट उतारना शुरू कर दिया । राजपूत सरदारों ने [दूलहराय]] को पुनः युद्ध बंद करने की सलाह दी । परंतु वह साम्राज्यवादी क्षुधा से पीड़ित था । अपनी सैनिक शक्ति पर विश्वास करते हुए उसने युद्ध जारी रखा । युद्ध करते समय वह घोड़े से गिर पड़ा और मौत के घाट उतार दिया गया ।

कर्नल टॉड ने लिखा है कि विरोधियों की सेना अधिक होने के कारण दूलहराय की सेना को परास्त होना पड़ा । यद्ध्यपि दूलहराय बड़ी वीरता से लड़ा लेकिन अंत में वह युद्ध में मारा गया । उसके मरते ही उसकी सेना भाग छूटी । मीणाओं के विजय-घोष से पृथ्वी डगमगाने लगी ।

मांच के प्रथम युद्ध में विजयी दूलहराय ने अजमेर की राजकुमारी मरोनी से विवाह कर लिया था । यह उसकी दूसरी रानी थी । मांच के दूसरे युद्ध में मरोनी, दूलहराय के साथ ही थी । वह उस समय गर्भवती थी । युद्ध-भूमि से वह बड़ी कठिनाई से भागने में सफल रही और अजमेर जाकर अपने पिता के पास रहने लगी । इसी की कोख से कांकिल देव का जन्म हुआ जो आगे चलकर आमेर का राजा बना ।

संदर्भ