मांच का प्रथम युद्ध

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राजपूत राजा दूल्हाराय ने गणगौर के अवसर पर मीणाओं के मांच राज्य पर अचानक आक्रमण कर दिया । मीणा सरदारों को जब इस आक्रमण का पता चला तो उन्होंने मुकाबला करने का निर्णय किया । परन्तु उनके सामने दौसा के बड़गूजरों व भांडारेज के मीणाओं की पराजय का उदहारण पेश था ।[1] अतः युद्धस्थल में उतरने से पूर्व उन्होंने अपने को संघठित किया और दौसा के बड़गूजरों व भांडारेज के मीणाओं को सहयोग देने के लिए आमंत्रित किया । उनको साथ लेकर मांच के मीणाओं ने दूल्हराय पर धावा बोल दिया । दूल्हराय के सैनिक भारी संख्या में मारे गए और संघर्ष में दूलहराय को पराजय का मुँह देखना पड़ा ।[2]

दूलहराय आहत होकर अपने घोड़े से युद्ध-भूमि पर गिर पड़ा ।[3] राजा स्वयं युद्ध में मूर्छित हो गया । राजा को मूर्छित देखकर मीणों ने बड़ी खुशियाँ मनाई ।[4] विजयी मीणों ने मदिरा का पान किया तथा जीत का जश्न मनाया ।[5] दूलहराय की परास्त सेना में मोरा राजा की सेना भी सम्मिलित थी ।[6]

मूर्छित अवस्था में राजा दूलहराय को अपनी कुलदेवी जमवाय माता के दर्शन हुए ।[7] जमवाय माता ने राजा को कहा- "डरो मत चढ़ाई करो । तुम्हारी मृत सेना पुनः सजीव हो जायेगी और तुम्हारी जीत होगी ।" कुलदेवी से ऐसा सुनकर दूलहराय मूर्छित अवस्था से उठा और उसने माता के दर्शन किये । देवी की प्रेरणा से उत्साहित होकर उसने दुर्ग पर आक्रमण कर दिया जहाँ कि मीणें विजयोल्लास में मदिरा पान कर जश्न मना रहे थे । नशे में चूर मीणें दूलहराय के इस आकस्मिक आक्रमण का मुकाबला नहीं कर सके । भयभीत होकर वे तितर-बितर हो गए ।[8] परिणामतः दूलहराय का मांच के दुर्ग पर अधिकार हो गया ।[9]

दूलहराय ने अपने ईष्ट देव व पूर्वज भगवान् राम के नाम पर मांच का नाम रामगढ़ रखा ।[10] युद्ध-भूमि में जहाँ राजा मूर्छित हुए थे, वहीँ पर उन्होंने जमवाय माता का मंदिर बनवाया ।[11] वर्तमान जमवारामगढ़ जयपुर से लगभग 34 कि.मी. उत्तर पूर्व में स्थित है ।

संदर्भ

  1. मुनि मगन सागर: मीन पुराण भूमिका पृष्ठ 71
  2. राघवेंद्रसिंह मनोहर: राजस्थान में खँगारोतों का इतिहास पृष्ठ 3-4
  3. हनुमान प्रसाद शर्मा: नाथावतों का इतिहास पृष्ठ 16-17
  4. जयपुर वंशावली पृष्ठ 16-17
  5. कर्नल टॉड: एनाल्स एण्ड एंटीक्विटिस ऑफ़ राजस्थान ज़ि.2
  6. चारण रतनू: राजस्थान का इतिहास
  7. जगदीश सिंह गहलोत: कछवाहा राज्य का इतिहास पृष्ठ 50
  8. हनुमान प्रसाद शर्मा: नाथावतों का इतिहास पृष्ठ 16-17
  9. जगदीश सिंह गहलोत: कछवाहा राज्य का इतिहास पृष्ठ 50
  10. हनुमान प्रसाद शर्मा: नाथावतों का इतिहास पृष्ठ 16
  11. कर्नल टॉड: एनाल्स एण्ड एंटीक्विटिस ऑफ़ राजस्थान ज़ि.2