मेरवाड़ा

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Author of this article is प्रभुनारायण मीणा

अजमेर-मेरवाडा और मेवाड़


मेवाड़ के इतिहास के प्रसिद्द विद्वान् राम वल्लभ सोमाणी ने मेव और मेर लोगो की भूमि होने के कारण ही मेवाड़ का नामकरण सही माना है श्री सोमाणी ने ग्यारहवी शताब्दी तक के पुराने साक्ष्य देकर यह सिद्द किया है की उस समय भी यह प्रदेश मेवाड़ के नाम से ही प्रसिद्द था | दूसरी तरफ कर्नल टाड ने अपनी पुस्तक में मेर ,मेव व मीना को एक ही माना है | रावत सारस्वत ने मेवाड़ शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है की यह शब्द मेव+आड़ से बना है और इसका सामान्य अर्थ मेवों अर्थात मीनों का वास स्थान | मेव शब्द ही आगे जाकर मेर शब्द में बदल गया | डूंगरपुर के रामचंद्र मीना पलात ने अपनी पुस्तक राजस्थान की वन विहारी जातिया में स्पष्ट लिखा है की मेवाड़ के मूल निवासियों का मूल संबोधन मीना ही रहा है | महता मुह्नोत नेणसी व कवी श्यामला दास ने भी अपने ग्रंथो में मीनों को मेर नाम से ही संबोधित किया है | कान्ठल प्रदेश में भाभरिया मेर का राज्य था उसकी पत्नी देउ मीनी थी जिसने नाम से देवलिया बसा | मेवाड़ का अहारी (अहाड़ी) गोत्र में मीना मूलतः बूंदी क्षेत्र के है उनका निकास उषारा गोत्र से है यहाँ से जाकर ये सर्वप्रथम भोराई पाल में जाकर बसे फिर अन्य क्षेत्रो में फैले | अजमेर की स्थापना अज्या मेर सरदार ने की थी चौहानों ने सांभर से आकर बाद में कब्ज़ा किया था मगरा मेरवाडा में मेरो का ही शासन था मुस्लिम आक्रमण होने पर पृथवीराज के पूर्वज बीसल देव ने मेर मीना मुखियाओ से सहयोग माँगा था उनकी सहायता से ही मुस्लिमो को हरा पाया था पृथ्वी राज रासो से पता चलता है की पृथ्वीराज चौहान के शासन काल में चांग पर मेर मिनाओ का आधिपत्य था चांग का पर्वत राय मेर मीना मंडोर के पडिहार राजा नाहर राय का मित्र था जो नाहर राय के पक्ष में पृथ्वी राज चौहान से लड़ा था मेवाड़ के बुज,माल, बरगोट, बरड, डाकल,कलासुवा,मनात,चंदाना,चीता गोत्र मगरा मेरवाड़ा के मेर मिनाओ के ही है जो यहाँ से मेवाड़ जाकर बसे | चीता गोत्र की उत्पत्ति टोंक जिले की मालपुरा तहसील के राव चीता मीना से है | चाँद सेन का राव चीता खोह गंग के प्राचीन राजा अभय चंद के वश का था जो आलन सिंह चांदा मीना के पूर्व खो गंग का राजा था |

खो गंग के पासचुलगिरी से वर्तमान मालवीय नगत और मोडल टाउन जगतपुरा फाटक तक बिदयाका कहलाता था बुढा विनायका गाँव के पास एक बावड़ी राव चीता ने ही बनवाई थी चिताणु गाँव दिल्ली रोड़ मूलतः चीता मिनाओ का ही था वहा इनकी कुलदेवी चामुंडा माता का 1200 साल पुराना मंदिर है | गिरधारी चीता के समय विदायका के पहाड़ो में स्थित काली माता को ही अपनी कुलदेवी मान स्थापना की अब चिताओं की कुलदेवी काली माता है बूंदी जिले के डाबी कसबे के आस पास के इलाके का नाम प्राचीन समय में बरड प्रदेश था देवगढ के पास बरडसी गाँव बसा जो बरडो का था जो बाद में बरडसी से बस्सी हो गया | खेराड इलाके के बनास नदी किनारे स्थित गोरम गढ़ पर प्राचीन काल से बरड (बरोड) मिनाओ का ही शासन रहा था | जिसे राणा प्रताप के भाई जगमाल ने छिना था धरियावाद को धरिया मेर मीना ने बसाया था जो बरड (बरोड़) गोत्र का था डूंगरपुर और बाँसवाड़ा जिलो के खराडी और परमार गोत्र के आदिवासी अपना निकास उदयपुर और चित्तोड़ गढ़ जिलों के बीच की मीना बहुल पट्टी में स्थित खरबर और ढंकावाडा गाँवो से मानते है |

अजमेर-मेरवाड़ा क्षेत्र में चोहनों के आगमन से पूर्व मेर आदिवासियों का आधिपत्य था उनके पूर्वज मत्स्य वंशी अज्जा मेर ने पहाड़ी की टेकरी पर गाँव बसा कबीलाई मेवासा राज्य (छोटा सा ) स्थापित किया | यहाँ कुच्छ ऐतिहासिक प्रमाण रखना उचित होगा ...दोस्तों यादगार ए मुराद अली पुस्तक जो 1889 में मुराद अली जी ने लिखी थी जिसका हिंदी अनुवाद नफीस मंसब ने किया है | यादगार ए मुराद अली के हवाले से नफीस मंसब ने अजमेर पर एक लेख लिखा जो राजस्थान पत्रिका के 25 अप्रेल 1999 के अंक में प्रकासित हुवा उसमे अजमेर राज्य के परिचय में बताया गया की अजमेर को अज्जा मेर दुवारा बसाया गया है न की अजय राज चौहान दुवारा जिसे रजा अज भी कहते है और पुष्कर रोड़ पर उसने अज गंध महादेव की भी स्थापना की थी कई इतिहासकार अजमेर की स्थापना 400 बी सी से 145 ई० के बीच मानते है | कर्नल टाड की पुस्तक अनल एण्ड एक्विटीटीज ऑफ़ राजस्थान के पृष्ट 443 की पाद टिप्पणी में इसका समर्थन किया गया है डब्लू डब्लू हंटर के बही भग-1 के पृष्ट-92 पर भी इसका उल्लेख है | जबकि इस क्षेत्र में चोहनों का प्रथम आगमन 6-7 शताब्दी के आसपास सांभर में हुवा 11वि सदी में मेरो को पराजित कर अपनी राजधानी बनाई | चांग में चीता मेर काबिज थे जिनका तेजा जी से गायो को लेकर झगड़ा हुवा यह घटना 1030 ई के आस पास की है | जिस पर एक लोकगीत है -

समया में सारस कुरलाया,

महलां में कुरलाई लाछा गुजरी,

अंडा ने मगर खाग्या रे,

गायां ने लेग्या मीणा चांग का |

उक्त विवरण से स्पष्ट होता है की अजमेर की स्थापना मेर आदिवासियों ने ही की थी आगे जाकर यह प्रदेश उनके नाम से ही अजमेर-मेरवाड़ा कहलाया | लेखनी के कसाई लोगो ने मेरो को चोहनों का ही वंश बता दिया जो पूर्णत गलत है | क्योकि मुस्लिम आक्रमणों क्र समय बीसल देव चोहान ने सहयोग के लिए सभी राजाओ को आमत्रित किया था रासो में उल्लेख है की उसने मेरो से भी सहयोग माँगा था | अब यह स्पष्ट किया जा सकता है की प्राचीन मत्स्य समुदाय का प्रतिनिधित्व वर्तमान मीना करते है और मेव तथा मेर इसकी प्रबल शाखाये है मेवाड़ से मेवो के पलायन के बाद बाहरी आक्रमणों से त्रस्त होकर चितोड़ के आस पास बसे वहा से पुरे मेवाड़ में फ़ैल गए जो बाद में रावत मीना कहलाये जो की इनकी उपाधि थी |.

दक्षिणी राजस्थान के मूलनिवासी शिक्षाविद,विचारक लेखक और इतिहासकार उदयपुर के हरीश चन्द्र मनात और गाँव भिंडा तहसील सीमलवाडा के रामचंद्र पलात का कहना है की बाहरी लोगो में यह मान्यता घर कर गई की दक्षिण राजस्थान में मीना कहलाने वाले लोग कतई नहीं रहते जबकि वस्तुस्थिति सर्वथा विपरीत है | यदि राजनीतिज्ञों , उनके गुर्गों तथा उच्च वर्णों दुवारा भ्रमित किये गए लोगों को छोड़ टे तो दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी अपने आको मीना ही कहते है मानते है और मीना कहने और कहलाने में गर्व अनुभव करते है | हमने भी इतिहास खोजा तो पाया की रामचंद्र जी और हरीश से बिलकुल सही कह रहे है हमे पुरजोर तथ्यों के साथ उनका समर्थन करना चाहिए वरना मीना मीणा विवाद की आड़ में दक्षिणी राजस्थान में दूसरा ही खेल खेला जा रहा अस्थितिव ख़त्म करने की साजिस ...|..

भौराई पाल गाँव जो उयपुर से 100 किलोमीटर दक्षिण में केशरिया जी -सलुम्बर मार्ग पर स्थित है जहाँ अहाड़ी (अहारी) मिनाओ की प्रधान पंचायत बैठक है | के अहड़ी मीनों का कहना है की हमारे पूर्वज मन्ना आहाड़ी बूंदी से आकर इस गाँव में बसे थे हमारे पूर्वजो का पहले बूंदी में राज्य था | कर्नल टाड के अनुसार 1342 तक बूंदी में उषारा मिनाओ का राज्य था जो पहले आमेर के भी शासक रहे है इस वंश के बूंदा मीना के नाम से ही बूंदी का नामकरण हुवा है | मेवाड़ी और बागड़ी बोलियों में उ का अ में और स का ह में बदलना एक सामान्य बात है -जैसे उड़द से अड़द और सासु से हाहू होता है र का ड में और आ का इ या इया में परिवर्तन उच्चारण की सुविधा के लिए कर लिया जाता है इस प्रकार उषारा का का आहाड़ी में परिवर्तन कोई असंभव बात नहीं अतः वहा के लोगो का कहना बिलकुल सत्य है अर्थात मेवाड़ में रहने वाले अहाड़ी या अहारी मीना है |.

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