मेव

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मेव

भारत के राजस्‍थान-उत्‍तरप्रदेश-हरियाणा-दिल्‍ली स‍हित पाकिस्‍तान में आजादी के समय पलायन करके गये मेव समाज के लोग मूलत: मत्‍सय/मीना/मीणा वंश के ही वे लोग हैं जिन्‍होनें भारत में बर्बर मुस्लिम शासकों के शासन के दौरान जबरन धर्म प‍रिवर्तन करवाकर मीणा से मेव मुस्‍ालमान बना दिया गया था, आज भी मेव व मीणा समाज के लोग भाई-चारे से रहते हैं तथा आज भी मीणा व मेव समाज के गोत्र समान हैं जो इस बात का पुख्‍ता प्रमाण हैं कि ये दोनो ही समाज मूलत: एक ही हैं। मीणा समाज के प्रमुख राजनेता श्रीमान डॉ. किरोडी लाल मीणा जी ने मेव व मीणा समाज में भाई-चारा स्‍थापित करने के लिए सराहनीय प्रयास किए हैं तथा मेव समाज उन्‍हें अपने सामाजिक सम्‍मेलनों सहित प्रत्‍येक सुख और दुख की घडी में याद करता है और उन्‍हें सम्‍मान प्रदान करता है।

मेवो में 12 पाल और 52 गोत्र है जिनमे से प्रमुख इस प्रकार है - डैमरोत (757 गाँव) ,दुलैत (360 गाँव),बालौत (260 गाँव), देडवाल(देवड़वाल)-252 गाँव, कलेसा(कलेसिया)- 224 गाँव, नाई गोत्र-210 गाँव, सिगल-210 गाँव,देहंगल- 210 गाँव,पुन्ज्लौत-84 गाँव, इनके अतिरिक्त -नांग्लौत,मोर झन्गाला, बमनावत, पाहट(राजा राय भान,टोडर मल और दरिया खां हुए),सौगन, बेसर, मारग, गुमल (गुम्लाडू), घुसिंगा, मेवाल, जोनवाल, चौरसिया, बिगोत, ज़ोरवाल और गोरवाल (हसन खां मेवाती जिसने मुगलों के विरुद्ध खनवा का युद्ध लड़ा) भाभला, गहलोत, खोकर, मीमरोट, कालोत, महर (बलबन के समय मलका महर प्रसिद्द हुए), भौंरायत, पडिहार, बुरिया आदि प्रमुख गोत्र है |

1857 की क्रांति में मेवो का महत्वपूर्ण योगदान है लगभग 1000 मेव शहीद हुए थे | रूपड़ा का गाँव में 1857 में अंग्रेज समर्थक राजपूत और मेवो में घमासान युद्ध हुआ था जिसमे अंग्रेजो और राजपूतो की संयुक्त सेना से लड़ते हुए 400 मेव शहीद हुए थे | मेव आदिवासी समाज का ही हिस्सा है जो आज भी हक़ और अधिकार से वंचित है |

प्रमुख व्यक्तित्व

नरसिंह मेव ने हसन खां मेवाती के जीवन काल में हसन खां मेवाती की कथा लिखी इसमें वर्णन है -

लिखि लिखि कागद करते बाद | मुल्कि मिलाई लह पथ हाथि | सिस्योदिया अरु गोवलवाल | करहि मंत्र दूनो भोवाल ||113||

कै हारहि अलवरचितोड़ | कै मारहि क़ाबिल यों दौड़| राणी मिणी के दो जुड़ | भे कारण दूनो उड़ी चड़े ||114||

नर सिंह मेव दुवारा राणा सांगा को राणी का लाल और हसन खां मेवाती को मिणी की लाल बताया है | मेवाड़ की जनश्रुति में राणी जाया और मिणी जाया बरोबर अर्थात भाई भाई लोक प्रचलित है मेवाड़ के राणाओ ने मीनों को अपना धर्म भाई मानकर मीनों का सहयोग लेने के लिए इस नारे को खानवाके युद्ध,हल्दीघाटी युद्ध और दिवरे के युद्ध की तैयारियों के दौरान लगाया था | नरेठ के बादा जी ब्याडवाल के पिता चाँदसी (चन्द्रसेन) हसन खां का मित्र था उसी ने हसन खां को राणा सांगा का समर्थन करने के लिए तैयार किया और टोडाभीम में मुलाकात करवाई थी | इस युद्ध में धर्म सिंह बालौत भी लड़े थे बाद में रैनी प्रवेणी नांगल बसाई |

डॉक्टर मुंशी खाँ बालोत मेवों का इतिहास लिख रहे हैं । उनके मोबाइल नम्बर 9413631381 हैं |

References