Category:Meena Community languages

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मीना भाषा

पृष्ठभूमि राजस्थान भारत वर्ष के पश्चिम भाग में अवस्थित है जो प्राचीन काल से विख्यात रहा है। तब इस प्रदेश में कई इकाईयाँ सम्मिलित थी जो अलग-अलग नाम से सम्बोधित की जाती थी। उदाहरण के लिए जयपुर राज्य का उत्तरी भाग मध्यदेश का हिस्सा था तो दक्षिणी भाग सपालदक्ष कहलाता था । अलवर राज्य का उत्तरी भाग कुरुदेश का हिस्सा था तो भरतपुर, धोलपुर, करौली राज्य शूरसेन देश में सम्मिलित थे। मेवाड़ जहाँ शिवि जनपद का हिस्सा था वहाँ डूंगरपुर-बांसवाड़ा वार्गट (वागड़) के नाम से जाने जाते थे। इसी प्रकार जैसलमेर राज्य के अधिकांश भाग वल्लदेश में सम्मिलित थे तो जोधपुर मरुदेश के नाम से जाना जाता था । बीकानेर राज्य तथा जोधपुर का उत्तरी भाग जांगल देश कहलाता था तो दक्षिणी बाग गुर्जरत्रा (गुजरात) के नाम से पुकारा जाता था । इसी प्रकार प्रतापगढ़, झालावाड़ तथा टोंक का अधिकांस भाग मालवादेश के अधीन था। बाद में जब राजपूत जाति के वीरों ने इस राज्य के विविध भागों पर अपना आधिपत्य जमा लिया तो उन भागों का नामकरण अपने-अपने वंश अथवा स्थान के अनुरुप कर दिया । ये राज्य उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़, प्रतापगढ़, जोधपुर, बीकानेर, किशनगढ़, सिरोही, कोटा, बूंदी, जयपुर, अलवर, भरतपुर, करौली, झालावाड़, और टोंक थे। (इम्पीरियल गजैटियर) इन राज्यों के नामों के साथ-साथ इनके कुछ भू-भागों को स्थानीय एवं भौगोलिक विशेषताओं के परिचायक नामों से भी पुकारा जाता है। ढ़ूंढ़ नदी के निकटवर्ती भू-भाग को ढ़ूंढ़ाड़ (जयपुर) कहते हैं। मेव तथा मेद जातियों के नाम से अलवर को मेवात तथा उदयपुर को मेवाड़ कहा जाता है। मरु भाग के अन्तर्गत रेगिस्तानी भाग को मारवाड़ भी कहते हैं। डूंगरपुर तथा उदयपुर के दक्षिणी भाग में प्राचीन 56 गांवों के समूह को ""छप्पन नाम से जानते हैं। माही नदी के तटीय भू-भाग को कोयल तथा अजमेर के पास वाले कुछ पठारी भाग को ऊपरमाल की संज्ञा दी गई है। (गोपीनाम शर्मा / सोशियल लाइफ इन मेडिवियल राजस्थान / पृष्ठ 3) राजस्थान में बोली जाने वाली भाषा राजस्थानी कहलाती है। यह भारतीय आर्यभाषाओं की मध्यदेशीय समुदाय की प्रमुख उपभाषा है, जिसका क्षेत्रफल लगभग डेढ़ लाख वर्ग मील में है। वक्ताओं की दृष्टि से भारतीय भाषाओं एवं बोलियों में राजस्थानी का सातवां स्थान है। सन् 1961 की जनगणना रिपोर्ट के अनुसार राजस्थानी की 73 बोलियां मानी गई हैं। सामान्यतया राजस्थानी भाषा को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। इनमें पहला पश्चिमी राजस्थानी तथा दूसरा पूर्वी राजस्थानी। पश्चिमी राजस्थानी की मारवाड़ी, मेवाड़ी, बागड़ी और शेखावटी नामक चार बोलियाँ मुख्य हैं, जबकि पूर्वी राजस्थानी की प्रतिनिधी बोलियों में ढूँढाडी, हाड़ौती, मेवाती और अहीरवाटी है। ढूँढाडी को जयपुरी भी कहते हैं। पश्चिमी अंचल में राजस्थान की प्रधान बोली मारवाड़ी है। इसका क्षेत्र जोधपुर, सीकर, नागौर, बीकानेर, सिरोही, बाड़मेर, जैसलमेर आदि जिलों तक फैला हुआ है। राजस्थानी भाषा की प्राचीनता के प्रमाण सदियों से मिलते हैं जो1585 ई. से 1799 ई. के मध्य दिल्ली बादशाहों द्वारा लिके गये 140 फरमान, 18 मन्सूर तथा 132 निशान जयपुर रिकॉर्ड में सुरक्षित थे। 3 निशान, 37 फरमान जोधपुर रिकॉर्ड में तथा 1 फरमान, 8 निशान सिरोही रिकॉर्ड में सुरक्षित थे। यह सामग्री अब राजस्थान राज्य अभिलेखागार बीकानेर में संरक्षित की हुई है। राजस्थानी भाषा के परवाने खरीते, अर्जियां, चिट्ठियां, पानड़ी ऐसे फुटकर पत्र है, जिनमें राजस्थान के शासकों, अधिकारियों, ग्राम कर्मचारियों आदि का पारस्परिक व्यवहार स्पष्ट होता है। इस व्यवहारगत अध्ययन से इतिहास विषयक सामग्री भी प्राप्त होती है। राजस्थानी भाषा में लिखित अन्य प्रमुक इतिहास स्रोत विभिन्न राजपूत राज्यों में लिखी गई बहियां हैं, इन बहियों को लिखने की प्रथा कबसे आरंभ हुई इसका सही समय बतलाना कठिन है, किंतु सबसे प्राचीन बही जो प्राप्त होती है वह राणा राजसिंह (1652-1680 ई.) के समय की है, इसके पश्चात् दूसरी प्राचीन महत्वपूर्ण बही ""जोधपुर हुकुमत री बही है। राजस्थान भारत का एक प्रान्त है। इसकी राजधानी जयपुर है। राजस्थान भारत गणराज्य के क्षेत्रफल के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है। इसके पश्चिम में पाकिस्तान, दक्षिण-पश्चिम में गुजरात, दक्षिण-पूर्व में मध्य प्रदेश, उत्तर में पंजाब, उत्तर-पूर्व में उत्तर प्रदेश और हरियाणा है। राज्य का क्षेत्रफल 3,42,239 वर्ग कि.मी. (1,32,139 वर्ग मील) है। भौगोलिक विशेषताओं में पश्चिम में थार मरुस्थल और घग्गर नदी का अंतिम छोर है। विश्व की पुरातन श्रेणियों में प्रमुख अरावली श्रेणी राजस्थान की एकमात्र पहाड़ी है, जो कि पर्यटन का केन्द्र है, माउंट आबू और विश्वविख्यात दिलवाड़ा मंदिर को सम्मिलित करती है। पूर्वी राजस्थान में दो बाघ अभयारण्य, रणथम्भौर एवं सरिस्का हैं और भरतपुर के समीप केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान है, जो सुदूर साइबेरिया से आने वाले सारसों और बड़ी संख्या में स्थानीय प्रजाति के अनेकानेक पक्षियों के संरक्षित-आवास के रूप में पक्षियों की रक्षार्थ निर्मित किया गया है। राजस्थान भारतवर्ष के पश्चिम भाग में अवस्थित है जो प्राचीन काल से विख्यात रहा है। तब इस प्रदेश में कई इकाईयाँ सम्मिलित थी, जो अलग-अलग नाम से सम्बोधित की जाती थी। राज्य का क्षेत्रफल 3.42 लाख वर्ग कि.मी है जो भारत के कुल क्षेत्रफल का 10.40 प्रतिशत है। यह भारत का सबसे बड़ा राज्य है। वर्ष 1996-97 में राज्य में गांवों की संख्या 37889 और नगरों तथा कस्बों की संख्या 222 थी। राज्य में 33जिला परिषदें, 235 पंचायत समितियां और 9125 ग्राम पंचायतें हैं। नगर निगम 4 और सभी श्रेणी की नगरपालिकाएं 180 हैं। सन् 1991 की जनगणना के अनुसार राज्य की जनसंख्या 4.39 करोड़ थी। जनसंख्या घनत्व प्रति वर्ग कि.मी. 126 है। इसमें पुरुषों की संख्या 2.30 करोड़ और महिलाओं की संख्या 2.09 करोड़ थी। राज्य में दशक वृद्धि दर 28.44 प्रतिशत थी, जबकि भारत में यह औसत दर 23.56 प्रतिशत थी। राज्य में साक्षरता 38.81 प्रतिशत थी जबकि भारत की साक्षरता तो केवल 20.8 प्रतिशत थी । राज्य में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति राज्य की कुल जनसंख्या का क्रमश: 17.29 प्रतिशत और 12.44 प्रतिशत है। राजस्थान की जनजाति राजस्थान में आदिवासी जनसंख्या की दृष्टि से मीणा जाति का प्रथम स्थान है। यह राजस्थान के सभी क्षेत्रों में पाई जाती है लेकिन मुख्यतया जयपुर, अलवर, दौसा, सवाई माधोपुर, करौली और उदयपुर जिलों में निवास करती है। मीणा जाति अपनी उत्पत्ति भगवान विष्णु के दसवें अवतार अर्थात् मत्स्यावतार से होना मानती है। मीणा शब्द की उत्पत्ति मीन शब्द से हुई है जिसका अर्थ मछली होता है। कुछ लोगों का मानना यह भी है कि मीणा बहुल होने के कारण ही अलवर, भरतपुर आदि क्षेत्र को मत्स्य प्रदेश कहा जाता है। प्राचीनकाल में मीणा जाति में ब्रह्म विवाह एवं गंधर्व विवाह का प्रचलन था लेकिन वर्तमान में अन्य जातियों की तरह रीति रिवाज के अनुसार विवाह होते हैं। इनमें प्रायः बाल विवाह का प्रचलन है लेकिन गौना वयस्क होने पर ही किया जाता है। इनमें संयुक्त परिवार प्रथा का प्रचलन है तथा परिवार पितृ सत्तात्मक होते हैं। निःसंतान दंपति को गोद लेने का अधिकार होता है। मीणाओं में जाति पंचायत का सामाजिक नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये सामाजिक झगड़े व विवाद यथा- नाता, विवाह विच्छेद, मौसर, ऋण आदि का निपटारा इन पंचायतों में करते हैं। इनमें सबसे बड़ी पंचायत "चौरासी पंचायत" होती है। मीणा जाति में मेले एवं त्योहारों का भी विशेष महत्व है। श्री महावीरजी, करौली, सवाई माधोपुर के गणेशजी तथा सीकर के जीणमाता के मंदिर पर मीणाओं के मेले लगते हैं।मीणा जनजाति के लोग विभिन्न उत्सव में नृत्य करते हैं तथा गीत भी गाते हैं। इनकी स्त्रियाँ प्रायः देवी देवताओं के गीत गाती है। होली के दिन उदयपुर जिले के खेरवाड़ा क्षेत्र और डूंगरपुर में "नेजा नृत्य" किया जाता है। मीणा पुरुष धोती व कमीज पहनते हैं तथा सिर पर साफा बाँधते हैं। स्त्रियाँ घाघरा, काँचली व ओढ़नी का प्रयोग करती है। शहरी क्षेत्र में व्यक्ति पेंट, शर्ट आदि आधुनिक वस्त्र भी पहनते हैं।आर्थिक स्थिति व अन्य -मीणा जनजाति प्रधानत: कृषक वर्ग है जो कृषि के साथ साथ पशुपालन भी करते हैं। ये स्त्री पुरुष गोदना गुदवाना पसंद करते हैं। मीणा जनजाति में बँटाईदारी कृषि व्यवस्था का भी प्रचलन है।मीणा समाज में शिक्षा का तेजी से प्रसार होने तथा सरकारी सेवाओं में आरक्षण व अन्य सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाने के कारण मीणा जनजाति की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है। मीना बोली ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ,वं पूर्व पीठिकाः अब तक यूरोपीय और भारतीय भाषविद् मोटे तौर पर हाड़ोती या जयपुरी समूह की बोलियों में ही समाहित करते आ रहे हैं जो कि तार्किक और भाषावैज्ञानिक -ष्टि से न तो तर्कसंगत है और न ही ऐतिहासिक। 13-1 मीना बोली का भाषायी क्षेत्र सर्वेक्षण-परियोजना की संप्राप्तिः मीना का शाब्दिक अर्थ है मीना या मत्स्य अर्थात् मीना समुदाय द्वारा बोली जाने वाली भाषा/बोली/ ,क भाषा का नाम बोध कराने के लि, यह नाम इस -ष्टि से प्रकल्पित किया है, जिससे ,क ओर हाड़ोती तथा दूसरी ओर जयपुरी और ढूँढ़ाड़ी से इसकी भिन्नता स्पष्ट जाहिर हो जाय। मीना ’ डपदं स्ंदहनंहम रू प्ज पे ेचवामद पद ेवउम चंतज वि त्ंरेंजींद ंदक डंकीलं च्तंकमेी राजस्थानी भाषा की ,क प्रमुख उपभाषा (बोली) है जो कि मारवाड़ी के बाद राजस्थान में सर्वाधिक बोली जाती है। इसका भाषायी क्षेत्र पूर्वी राजस्थान के झालावाड़ जिले के खानपुर कस्बे से लेकर सुदूर उत्तरी-पूर्वी राजस्थान के अलवर-भरतपुर जिलों तक फैला हुआ है। चूंकि मीना आदिवासी राजस्थान की प्रमुख प्राचीन आदिवासियों में से ,क हैं। अतः राजस्थान में बसने वाले आदिवासियों में मीना आदिवासी की जनसंख्या सर्वाधिक है। इस भाषा का प्रसार झालावाड़, कोटा, बारॉ जिले के कुछ भाग बूँदी, टोंक, सवाई माधोपुर, करौली, धौलपुर जिले का कुछ भाग, दौसा, अलवर, भरतपुर जिले का कुछ भाग तथा जयपुर जिलों में प्रमुख रूप से है।

 आलोच्य सर्वेक्षण के दौरान पाये गये भाषिक तत्वों के आधार पर पूर्वी राजस्थान सवाई माधोपुर करौली, भरतपुर के पश्चिमी भाग, टोंक के पूर्वी भाग, बूँदी, कोटा के ,क तिहाई भाग, वारा के दो तिहाई भाग तथा झालावाड़ जिले इसके भाषायी क्षेत्र हैं। साथ ही, भीलगड़ा के जहाजपुर, कोहड़ी, मांडलगढ़, चित्तौड़गढ़ के मेनाल और बेगू में भी इसका ,क अन्य रूप प्रचलन में हैं। इसके पूर्व में राजस्थानी ब्रज, उत्तर में मेवाती, उत्तर पश्चिम में तोरावाटी, पश्चिम में जयपुरी, दक्षिण पश्चिम में किशन गढ़ी और हाड़ोती दक्षिण में मालवी, दक्षिण पूर्व में बूँदेली और सहरीे का भाषायी क्षेत्र है। विश्व की प्रमुख भाषाओं की पुस्तक ,थनॉलोग(म्जीदवसवहनम) में वणिर््kत सूची में मीना भाषा कोड1 (उलप)के साथ 1971 की जनसंख्या के अनुसार इसके बोलने वालों की संख्या 900000, 1991 में 1900000 दर्शायी है और 2001 में 3800000 और 2011 में 5200000 मानी गयी है ।  

मीना भाषा प्राचीन काल से अपनी भाषिक विशिष्टताओं को धारण किये हुये हैं किंतु दुर्भाग्य से किसी भी भाषाविद या शोधार्थी ने इसकी विशिष्टताओं पर ध्यान नहीं दिया। कारण जो भी रहें हो, किंतु, विश्व की भाषाओं में मीना भाषा का नामोल्लेख भी मिलता है। मीना भाषा पर व्यापक शोधकार्य की जरूरत है जिससे इसके स्वरूप पर गहनता से प्रकाश डाला जा सके। सर्वे के दौरान क्षेत्रीय स्तर भेद भी परिलक्षित हुये है जिनमें झालावाड़ क्षेत्र की मीना बोली, सवाई माधोपुर क्षेत्र की मीना बोली, दौसा अलवर क्षेत्र की मीना बोली रूप प्रमुख रूप से मिलते हैं। इस आधार पर इसको दो भागों में बॉंटा जा सकता है- उत्तरी मीना बोली और दक्षिणी मीना बोली जिनमें वाचिक स्तर पर क्षेत्रीय भेद मिलते हैं । 13-2 मीना की भाषिक विशिष्टताएँ 13-2-1 ध्वनि स्तर 1) मीना बोली में स्वरों का उच्चारण अव्यवस्थित-सा है। कई स्थलों पर दीर्घ आ (ंरू) का उच्चारण अ (ं) की तरह, ‘,’, ‘ऐ’ का उच्चारण अ’ (ंश्) की तरह और ‘औ’ (ग्) का उच्चारण ‘ओ’ (0) की तरह उच्चारित किया जाता है। 2) अधिकांशतः स्वरों के ह्रस्वीकरण की प्रक्रिया यत्र-तत्र-सर्वत्र दिखायी पड़ती है। 3) वहीं व्यंजनों के उच्चारण में ‘स’ का उच्चारण ‘ह’, कुछ स्थलों में ‘छ’ (बी) का उच्चारण साधारणतः ‘स’ (े), और 4) व्यंजनों के उच्चारण में ‘स’ (े) का उच्चारण है ‘ह’ (ी), कुछ स्थलों में ‘छ’ (बी) का उच्चारण साधारणतया ‘स’ (े) और 5) अधिकांश सर्वेक्षण स्थलों पर तालव्य ‘श’ (े), मूर्धन्य ‘ष’ (ेश्) के स्थान पर दंत्य ‘स’ (े) का उच्चारण ही मिलता है। ‘व’ को कहीं (ू), (अ) लिपिवद्ध किया गया है किंतु यह सर्वत्र ‘ब’ (इ) बन जाती है। जैसे वदन (ूंकमद) झ बदन (इंकंद) = चेहरा (बीमीमतंरू) िंबम विचार (ूपबींरूत) झ बिचार (इपबींतरूत) = सोचना (सवबींदं) ज्ीवनहीज च (ब), छ (बी) का उच्चारण कहीं-कहीं स (े) किया जाता है। चक्की (थ्सववत डंबीपदम) सक्की छाछ ( ) सास 6) राजस्थानी में यही प्रवृत्ति लक्षित होती है। सर्वेक्षण में पाया गया कि मीना बोली में ‘व’ ध्वनि ह्रस्व या दीर्घ अ, उ, ओ, ऐ और औ के पहले यह ध्वनि (ू) के नजदीक रहती है तथा ह्रस्व या दीर्घ इ या , से पूर्व यह (अ) के कर करीब लगती है। जब तक (ू) और (अ) व्यंजन विशुद्ध ओष्ठ्य या दंतोष्ठ्य ध्वनि है, तब तक उसके उच्चारण पर उसके पश्चात् आने वाले स्वर से प्रभावित होती है। 7) ध्वनि ऊपर के दाँतों को निचले होठ पर दबाने से उत्पन्न होती है यह ,क दंतोष्ठ्य ध्वनि है। व (ू) विशुद्ध ओष्ठ्य ध्वनि मानी जाती है जो दाँतों को ओठ पद दबा कर नहीं बल्कि दोनों ओठों के बीच से श्वास के निकलने से होती है। 8) साथ ही, इसमें मूर्धन्य ध्वनियों की बहुलता पायी जाती है। ‘ळ’ (स्) तथा ‘ण’ (त) यहाँ खूब प्रचलित है। सर्वेक्षण के दौरान अधिकांश संकलित सामग्री में ‘ळ’ (स्) तथा ‘न’ (द) ध्वनि का मारवाड़ी मूर्धन्यीकरण स्वरूप ही पाया गया किंतु शब्दारंभ (पदपजपंससल चवेपजपवद) में इन ध्वनियों का मूर्धन्यीकरण नहीं मिलता है, ऐसी स्थिति में ये हिंदी की ध्वनियों की भाँति ही उच्चरित होती हैं। 9) मीना बोली में ‘उ’ (क) ड़ (क्), ‘ढ’ (की), ढ (क्3) ध्वनियों में ‘ड़’ (क्) और ‘ढ़’ (क्3) की बहुलता और प्रधानता मिलती है। 13-2-2 शब्द स्तर 1) शब्दांत में ‘-यो’ /ड़/ के प्रयोग की प्रवृत्ति मिलती है; यथा- गुवाळयो, ग्वाल, गदैड़ो = गधा, कुतरो = कुत्ता आदि। 2) ‘खोंर’ मीना बोली का अपना शब्द है जो ‘किस तरफ’ के अर्थ में प्रयुक्त होता है। 3) ‘म्होंर’ मीना बोली का अपना शब्द है जो ‘उस तरफ’ के अर्थ में प्रयुक्त होता है। 4) ‘चणकट’ भी मीना बोली का अपना शब्द है जो ‘थप्पड़’ के अर्थ में प्रयुक्त होता है। 5) ‘भैण’ मीना बोली का अपना शब्द है जो ‘बहिन’ के रूप में प्रयुक्त होता है। 6) ‘मोंफूकी’ मीना बोली का अपना शब्द है जो ‘चोरी’ के रूप में प्रयुक्त होता है। 7) ‘उझेळ’ मीना बोली का अपना शब्द है। राजस्थानी की अन्य बोलियों में इसका यह रूप नहीं मिलता है। 8) ‘उजूद’ मीना बोली का अपना शब्द है जो ‘मौजूद के विलोम’ के रूप में प्रयुक्त होता है। 9) ‘उचंद’ मीना बोली का अपना शब्द है जो ‘उधार’ के रूप में प्रयुक्त होता है। 10) ‘उघाड़ीछाती’मीना बोली का अपना शब्द है जो‘हिम्मत(संज्ञा)साहसी वीर(वि-), वीरता पूर्वक(क्रि-

   वि-)’ के रूप में प्रयुक्त होता है। 

11) ‘ऊडंड’ मीना बोली का अपना शब्द है जो ‘घोड़ा’ के रूप में प्रयुक्त होता है। 12) ‘हुदिळ’ मीना बोली का अपना शब्द है जो ‘व्यभिचारिणी’ के रूप में प्रयुक्त होता है। 13) ‘बोगाळी’ मीना बोली का अपना शब्द है जो ‘जुगाली’ के रूप में प्रयुक्त होता है। 14) ‘छैलो’ मीना बोली का अपना शब्द है जो ‘नखरेबाज’ के रूप में प्रयुक्त होता है। 15) ‘ताजण’ मीना बोली का अपना शब्द है जो ‘घोड़ी’ के रूप में प्रयुक्त होता है। 16) ‘नबळाई’ मीना बोली का अपना शब्द है जो ‘निर्बलता’ के रूप में प्रयुक्त होता है। 17) ‘दाळद’ मीना बोली का अपना शब्द है जो ‘निर्धनता’ के रूप में प्रयुक्त होता है। 18) ‘गाअटो’ मीना बोली का अपना शब्द है जो ‘खलिहान में पशुओं के पैरों अनाज को भूसे से अलग करना’ के रूप में प्रयुक्त होता है। 19) मीना बोली में आघात (ेजतमेे) की व्यवस्था भी दिखायी पड़ती है। सर्वेक्षण में रूसी भाषा की तरह शब्दाघात की व्यवस्था देखने को मिली किंतु उसके लेखन के लि, कोई लिपि चिह्न नहीं मिलता। अतः मैंने आघात को (ॅ) के चिह्न से अंकित किया है। 13-2-3 संरचना स्तर 19) मीना बोली में दो लिंग मिलते हैं - पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग। शब्दों की ओकारांतता पुल्लिंग की द्योतक है तथा ईकारांतता स्त्रीलिंग की। आकारांत दोनों ही लिंगों में पायी जाती है। 20) प्रश्नवाचक (अप्राणीवाचक)सर्वनाम के लि, ‘काँई’ तथा (प्राणीवाचक) के लि, ‘कुण’ का प्रयोग मिलता है। 21) मीना बोली में सहायक क्रिया या  छ् (वर्तमान तथा भूतकाल) तथा ग (भविष्यकाल) की द्योतक हैं। 22) मीना बोली में पुरुषवाचक सर्वनामों में उत्तम पुरुष और मध्यम पुरुष में ‘हॅूं/म’ और ‘तू/थम’ रूप भी सुनाई पड़ते हैं। 23) साथ ही, मीना बोली में म्हूं, तू, थू ,कवचनीय रूप और म्हाँ, थाँ बहुवचन के रूप मिलते हैं। 24) मीना बोली के भविष्यकालिक रूप जोड़ने से बनते हाड़ोती में ‘सी’ सहायक क्रिया रूप से निष्पन्न होते हैं। 25) मीना बोली में स्थानवाचक क्रिया विशेषण म्हाँ, ज्यां, खां आदि हैं और स्थान संकेत वाचक क्रिया विशेषण अत,अड़ी(इधर), कत,कड़ी(किधर) आदि है हाड़ोती में इनके स्थान पर उठे, कठै आदि प्रयुक्त होते हैं। 26) मीना बोली के कुछ संज्ञा शब्दों के साथ विभत्तिफ़-योजना द्वारा भी अधिकरण कारक की अभिव्यक्ति होती है; यथा- जयपुरी मीना बोली हिंदी डागळे होर निकल जाज्यो। डागळा म होर नकळ जाज्यो। = छत पर होकर निकल जाना। वो कुग्गेलाँ चालवा लाग्यो। बा कुग्गेलाँ चालब लाग गियो। = वह कुमार्ग पर चलने लगा। 27) मीना बोली में संकेतवाचक ,क वचन सर्वनाम के रूप लिंग से प्रभावित है,हिंदी में नहीें बा (वह,पुं-), बा (वह,स्त्री-) या (यह,प)ुं- यो (स्त्री-) 28) सभी संज्ञा-शब्दों के हिंदी की भांति ही आलोच्य बोली में भी तीन प्रकार के रूप-मूल विकारी ,वम् संबोधन- दो वचन - ,क वचन ,वम् बहुवचन- में प्राप्त होते हैं। 29) संज्ञा शब्दों में लिंग ,क आंतरिक कोट है जबकि सर्वनाम, विशेषण तथा क्रिया-रूप-रचना में यह ,क व्याकरणिक कोटि हैं। 30) पुल्लिंग संज्ञाएँ रूप-रचना की -ष्टि से दो वर्गों- ओकारांत व अन्य में विभाजित है। समस्त स्त्रीलिंग संज्ञाओं के केवल ,क ही प्रकार के रूप उपलब्ध होते हैं, जबकि हिंदी स्त्रीलिंग संज्ञा शब्दावली रूप-रचना की -ष्टि से दो वर्गों - ईकारांत, इकारांत या याकारांत ,वं अन्य में विभक्त है। हिंदी के समान ही आलोच्य बोली में विकारी कर्ता-रूपों के साथ ‘नै - न’ परसर्ग जुड़ता है। 31) सर्वनामों में व्याकरणिक कोटियाँ दो - वचन तथा कारक है। सर्वनाम रूपों में वचन के अनुसार पृथक-पृथक रूप केवल पुरुषवाचक, संकेतवाचक, संबंधवाचक सर्वनामों में ही मिलते हैं, अनिश्चयवाचक, निजवाचक तथा प्रश्नवाचक सर्वनाम रूपों में नहीं। 32) मीना बोली में ‘ह-कार’ (ी कमसपजपवद) की प्रवृत्ति दिखायी पड़ती है जैसे पहला पहिलो झ पइलो (पितेज) कहना-कहणो झ कॅणो / कॅवणो (जव ेंल) साथ ही, महाप्राणत्व वाचिक ‘था’ मौखिक रूप में नहीं मिलता है

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