लोकगीत

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मीणा आदिवासी सांस्कृतिक धरोहर में लोकगीत सर्वोपरि है । इन गीतों में कवित्र,कथा,स्वरलय व ताल सम्मिलित होते है । गायन द्वारा शाब्दिक चित्रण बड़ा सहज भाव से व्यक्त किया जाता है । प्राचीन काल से ही लोकगीत मीणा समाज मेँ जीवन का एक अभिन्न अंग रहे है चाहे मांगलिक कार्य हो या उत्सव,देवी-देवताओं को मनाने के लिए कोई पूजा हो या किसी संस्कार,मेले या दैनिक कार्य करने का समय वह अपने मनोभावों की अभिव्यक्ति लोक गीतों के रूप में करते है ये लोक जागृति का सफल माध्यम भी है । इन लोकगीतों ने ही मीणा समुदाय की प्राचीन परम्पराओं,संस्कृति और इतिहास को अभी तक संजोए रखा है । क्या इनको संरक्षण की आवश्यकता नहीं है ?

बेशक हमारी लोक संस्कृति अमूल्य धरोहर हैं यें लोक गीत,केवल मांगलिक कार्यों और उत्सव तक ही सिमित नही हैं बल्कि इन लोक गीतों के जरिये समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने का सन्देश देतें हैं हमे हमारी आदिवासी संस्कृति व् लोक कलां को हमेशा संरक्षित रखना हैं . तथाकथित पढ़े लिखे लोग इसे असभ्यता मानते है ग्वारपन समझते है पर यह उनकी ना समझी है अपनी पहचान लोक संस्कृति को मिटा कर सभ्य नही बना जा सकता समय के जरूरत के हिसाब से इनमें रचनात्मक बदलाव करके समाज को जागृत किया जा सकता है लोक गीत प्रेरेणा देते,प्रोत्साहन देते है,नई दिशा और समाधान देते है,हमारी संस्कृति को जिंदा रखते है आम आदिवासी बौध्दिक भाषणो के बजाये लोकगायको की भाषा अच्छी तरह से समझते है अतः लोकगीतो को माध्यम बना कर अंधविश्वासो व सामाजिक बुराईयोँ को काफी हद तक खत्म कर शिक्षा के लिए प्रेरित किया जा सकता है अतः इनको संरक्षण की आवश्यकता है ।लोक संगीत समाज का आइना होता है और आदिवासियो की तो यह आत्मा है इसके बिना उनका अस्तित्व ही नही ।कभी जयपुर महाराजा तीज के मेले मे बड़ी चौपड़ पर बैठकर सुनते थे और अच्छे गायको इनाम भी देते थे ।

गत कुछ सालों में राजस्थान के मीणा आदिवासियों के वैभव और विक्रम को, जल जंगल जमीन के धर्म को, राग और रंगो को, रूप और रास को, न जाने किसकी नजर लग गई है । फिर भी यह महान जाति बड़ी प्रसन्न, उदार और अलमस्त सहृदय रही है, उनके तन पर गोदनो की सुन्दरता, पक्षी जानवर व पेड़ों में देव आस्था, मेलों का लोक रंग, उनके कंठ में गीत का अमृत और पैरों में नृत्य का सम्मोहन रचा हुआ है ! ! ! ! ! ! ! !